मंथन


माक्र्सवादी मन की व्यथा

-- देवेन्द्र स्वरूप

आजकल टेलीविजन का पर्दा कुछ खाली-खाली सा लग रहा है। बहुत समय से उस पर माकपा, अरे! वही माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का वह सफेद पगड़ी और सफेद दाढ़ी वाला चेहरा नजर नहीं आ रहा। चिन्ता की बात यह है कि उनके बिना भारत की राजनीति चल कैसे रही होगी? जब तक वे टेलीविजन के पर्दे पर दिखायी देते रहते थे, हमें भरोसा रहता था कि वे राजनीति को चला रहे हैं। वैसे कुछ लोग कभी-कभी सवाल उठा देते थे कि ये राजनीति कैसे चलाएंगे? ये खुद तो पूरे भारत में कहीं-पंचायत का चुनाव जीतने लायक भी जनाधार नहीं जुटा पाए हैं। किन्तु हमें विश्वास था कि भारत की राजनीति उन्हीं की उंगलियों पर नाच रही है। फर्क इतना ही है कि वे चुनाव के मैदान में नहीं जाते "ड्राइंगरूम' में या "डाइनिंगरूम' में बैठकर राजनीति करते हैं। तब आजकल वे किस "ड्राइंगरूम' में हैं, किसके साथ खिचड़ी पका रहे हैं? किसी ने कहा कि शायद चुनाव आयुक्त एम.एस. गिल के "ड्राइंगरूम' में बैठे होंगे और सोच रहे होंगे कि पता नहीं ये गिल साहब कहां से चुनाव आयोग का 1968 का एक नियम खोज लाए हैं? उनका कहना है कि इस नियम के अनुसार माकपा यानी माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को अब राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता नहीं दी जा सकती, क्योंकि नियम के अनुसार राष्ट्रीय मान्यता पाने के लिए किसी पार्टी को भारत के कम से कम चार राज्यों में कुल मतों का कम से कम छह प्रतिशत मत पाना जरूरी है। यह शर्त हमारी पार्टी पूरी नहीं कर पा रही है क्योंकि बंगाल, त्रिपुरा और केरल के बाहर किसी भी अन्य राज्य ने हमें छह प्रतिशत मत देने की उदारता नहीं दिखायी। किन्तु इससे क्या होता है? हम लोकसभा में तीसरे क्रमांक की पार्टी हैं। हमारे पास लोकसभा की 543 में से 33 सीटें हैं। आप कहेंगे केवल 33! कहां भाजपा की 182, कहां कांग्रेस की 140 और माकपा की केवल 33।

ताकत का अहसास

दाढ़ी वाले का कहना है कि इससे क्या होता है? हैं तो हम तीसरे क्रमांक पर ही। यह तर्क तो वैसा ही हुआ कि किसी बड़े राज्य जैसे 85 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में, 54 सीटों वाले बिहार में या 48 सीटों वाले महाराष्ट्र में या 39 सीटों वाले तमिलनाडु में कोई जातिवादी या क्षेत्रीय पार्टी 33 सीटें जीत कर लोकसभा में तीसरे क्रमांक की पार्टी बन जाए और दावा करे कि अब हमें भी राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता दी जानी चाहिए, क्योंकि हम तीसरे क्रमांक पर हैं। इसके जवाब में दाढ़ी वाले का कहना है कि आप यह क्यों भूल रहे हैं कि बंगाल में हमारा 23 साल से अखण्ड शासन चला आ रहा है। भला हो उस इन्दिरा गांधी का, जिसने 1975 से 1977 तक आपातस्थिति लागू करके हमें उस समय जयप्रकाश की लोकप्रियता और इन्दिरा विरोधी लहर पर सवार होकर सत्ता में आने का मौका दे दिया कि तब से हमने सत्ता के बल पर जाली मतदान का ऐसा शस्त्र विकसित किया है कि जो चाहे जितना सर पटक ले बंगाल में हमें हिला नहीं पाया है। हम चुनाव आयुक्त गिल साहब को कलकत्ता बुलाकर अपनी ताकत का अहसास करा चुके हैं। अभी वे पूरी तरह पिघले नहीं हैं, किन्तु 17 अगस्त को हम उन्हें नियम बदलने के लिए मजबूर कर ही देंगे। आखिर चार राज्यों में छह प्रतिशत पाने का नियम ही क्यों? तीन का क्यों नहीं? तीन राज्य तो हमारे पास हैं ही।

फिर हमारे राष्ट्रीय महत्व को भी आयोग को ध्यान में रखना चाहिए कि भारत की पूरी राजनीति हम चला रहे हैं। हम तीसरे मोर्चे के स्रष्टा हैं। दूसरे क्रमांक की पार्टी कांग्रेस की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी इस समय हमारी जेब में हैं। हमने उन्हें वि·श्वास दिला दिया है कि हम उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाकर ही चैन लेंगे। पिछली बार जयललिता, सुब्राह्मण्यम् स्वामी, अर्जुन सिंह, कांशीराम आदि के साथ "ड्राइंगरूम' राजनीति करके हमने भाजपा नीत गठबंधन सरकार को एक मत से गिराकर यह सिद्ध कर दिया है कि सरकारें गिराने की कला हमारे पास है। आप कहेंगे कि सरकार गिराने से ही काम नहीं चलता, बनाना भी तो चाहिए। सरकार तो आपने गिरा दी पर सोनिया को गद्दी पर आप नहीं बैठा पाए।

दाढ़ी वाले का कहना है कि उस समय हमसे थोड़ी चूक हो गयी थी पर अब नहीं होगी। अब हमने सोनिया की ईसाई चौकड़ी (एडुअर्ड फेलेरो, आस्कर फर्नांन्डीज, जार्ज विंसेंट और अजीत जोगी), कैथोलिक चर्च के कुछ शिखर नेताओं के साथ मिलकर इतनी पुख्ता योजना बनायी है कि इस बार यदि राजग सरकार गिरी तो वापस नहीं आ पाएगी। आई.एस.आई. के भारतीय एजेन्ट किसी भी चर्च के भीतर या बाहर बम विस्फोट करके आतंक और भय का वातावरण पैदा करेंगे, चर्च के नेता तुरन्त चिल्लाएंगे कि संघ परिवार के संगठन शान्तिप्रिय 2 प्रतिशत ईसाई समाज पर हमला कर रहे हैं और ये तभी से शुरू हुए हैं, जब से भाजपा को सत्ता में भागीदारी मिली है। उनके चिल्लाते ही प्रचार माध्यमों में घुसे हमारे वामपंथी मस्तिष्क संघ विरोधी प्रचार में जुट जाएंगे। भाजपा के मित्र दलों को ललकारेंगे कि भाजपा से अपना समर्थन वापस ले लो वरना देश हिन्दू साम्प्रदायिकता की आग में भस्म हो जाएगा। इससे केन्द्र सरकार गिर जाएगी और सोनिया के लिए रास्ता साफ हो जाएगा। और भाजपा के विरुद्ध सभी अल्पसंख्यकों को एकजुट करके हम सोनिया गांधी को विशाल जनाधार भी दे देंगे, तब उन्हें गद्दी पर बैठने से कौन रोक सकेगा? उनकी जीत होगी, वह गद्दी पर बैठेंगी तो हमें भी तो कुछ सीटें ज्यादा मिलेंगी। हमारा भी तो मतों का प्रतिशत बढ़ेगा और हमारे दल की राष्ट्रीय मान्यता बची रह जाएगी। इस रणनीति के तहत हमने अपने सब कलमघिस्सुओं को आदेश दिया है कि अब ईसाइयों पर हमलों के समाचार ही हमारी कलम का मुख्य विषय होना चाहिए। खूब समाचार बनाओ, खूब सम्पादकीय लेख और स्तम्भ लिखो। राजग के घटकों से साक्षात्कार लो, उन्हें तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करो। प्रचार माध्यमों में ऐसा वातावरण पैदा कर दो कि "हिन्दू' नाम का राक्षस बेचारे निरीह कमजोर ईसाइयों को चबाए जा रहा है। इसकी चिन्ता मत करो कि इस झूठे प्रचार से दुनिया में भारत की छवि खराब होगी, उसके मित्र राष्ट्र उससे नाराज हो जाएंगे। दाढ़ी वाले का कहना है कि हम इस सब बदनामी को भाजपा के खाते में डाल देंगे आखिर कलमघिस्सुओं की इतनी बड़ी फौज हमारे पास है। वह चाहे जो कर सकती है।

हां, थोड़ी सी परेशानी जरूर है। यह जो राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग है, जो पिछली बार ताहिर महमूद के नेतृत्व में पूरी तरह कैथोलिक पत्रकार जान दयाल के साथ मिलकर पूरी तरह हमारा साथ दे रहा था, इस बार कुछ गलत रास्ते पर जा रहा है। वह हर हमले के घटनास्थल पर जाकर सत्य को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा है, वह चर्च के नेताओं और हमारे प्रचार का शिकार बने वि·श्व हिन्दू परिषद् व बजरंग दल के नेताओं को साथ बैठाकर हमारे झूठे प्रचार की जड़ें काट रहा है। किन्तु इसकी भी काट हमने खोज ली है। हमने एक ओर तो आयोग के ईसाई सदस्य जान जोसेफ के खिलाफ सोनिया समर्थक इंकाई नेताओं से बयानबाजी शुरू करवा दी है कि जोसेफ स्वार्थी है, भाजपा का एजेन्ट है। नए अल्पसंख्यक आयोग के विरुद्ध भी जिहाद छेड़ दी है कि वह निष्पक्ष नहीं है। दूसरी ओर हमने वि·श्व हिन्दू परिषद् व बजरंग दल के नेताओं के साथ चर्च नेताओं की बैठक को टलवाने के लिए भी अपने छात्र संगठनों और सोनिया कांग्रेस के द्वारा आन्दोलन शुरू करवा दिया है कि यह बैठक नहीं होनी चाहिए, क्योंकि विहिप व बजरंग दल हिन्दू समाज के प्रतिनिधि नहीं हैं। अल्पसंख्यक आयोग से भी ज्यादा गड़बड़ कर्नाटक और आन्ध्र की राज्य सरकारें कर रही है, क्योंकि अभी जांच से यह सत्य उजागर होने का खतरा है कि इन हमलों के पीछे विहिप व बजरंग दल नहीं, आई.एस.आई., वामपंथी पी.डब्ल्यू.जी. और स्वयं चर्च है। अगर यह सत्य पूरी तरह सामने आ गया तो हमारी समूची रणनीति धराशायी हो जाएगी।

हमारी पार्टी को इससे भी बड़ा खतरा यह पैदा हो गया है कि बंगाल में हवा बदल रही है। पांसकुड़ा की सीट जो 23 साल से हमारे पास थी, इस बार ममता बनर्जी ने हमसे छीन ली। इससे हमें बहुत धक्का लगा। हसन सरूर जैसे हमारे वफादार कलमघिस्सु बुरी तरह घबरा गए। (देखिए "हिन्दू' 29 जून) उसे चिन्ता है कि कांग्रेस को लकवा मार गया है, भाजपा का गठबंधन टूट नहीं रहा, कम्युनिस्ट दल और उनके नेता अखबारों में वक्तव्य देने के अलावा जनता के बीच काम नहीं कर रहे, ऐसे में भारत में माक्र्सवाद जिन्दा कैसे रहेगा? अब हम हसन सरूर को कैसे समझाएं कि माक्र्स तो हमारे लिए सिर्फ मुखौटा रह गया है, अब तो हम माक्र्स को रद्दी की टोकरी में फेंक कर अम्बेडकर की गोद में बैठ गए हैं। (देखिए, स्मिता गुप्ता: टाइम्स आफ इण्डिया, 28 जून) इसी 25-28 अप्रैल को कलकत्ता में बैठकर हमने पार्टी का जो नया कार्यक्रम बनाया है, उसमें माक्र्स के वर्ग संघर्ष के सिद्धान्त को तिलांजलि देकर जाति संघर्ष का सिद्धान्त अपना लिया है। आखिर जाति संघर्ष को अपना कर ही तो कम्युनिस्ट पार्टी (माले) बिहार में आगे बढ़ रही है, एम.सी.सी. ताकत बन गयी है। लालू यादव और मुलायम सिंह उभर सके हैं। इसलिए अब हम भी जाति की राजनीति करेंगे। भले ही माक्र्स ने भारत की जाति संस्था की निन्दा की हो, उसे मिटाने की बात कही हो, भले ही हमारी पार्टी भी 1930 से जाति को मिटाने का संकल्प घोषित करती रही है, भले ही अम्बेडकर माक्र्सवाद और हमारी पार्टी के कट्टर विरोधी रहे हैं, पर करें क्या? जिन्दा तो रहना ही है। जिन्दा रहने की मजबूरी का नाम ही है अम्बेडकर। अब हम अम्बेडकर के गीत गाएंगे और अपना जनाधार बढ़ाएंगे।

पर इसके पहले कि अल्पसंख्यकवाद और जातिवाद की हमारी नयी रणनीति सिरे चढ़े, बंगाल हमें धोखे पर धोखा दे रहा है। धांधली की हमारी पूरी कोशिशों के बावजूद कलकत्ता नगर निगम पर से हमारा 19 साल पुराना कब्जा खत्म हो गया। उस पर ममता बनर्जी की तृणमूल पार्टी काबिज हो गयी। इतना ही हमें सन्तोष है कि 2 जुलाई को साल्ट लेक में दोबारा मतदान को हमने धांधली की पुरानी कला का इस्तेमाल करके बचा लिया पर "स्टेट्समैन' जैसे अखबारों ने उस दिन की धांधली का पूरा विवरण छापकर अब धांधली के रास्ते भी बन्द करने की कोशिश शुरू कर दी है।

जनाधार के घटने का असर हमारे साथियों पर पड़ने लगा है। अभी तक हम बारह छोटे-छोटे दलों का वाममोर्चा बनाकर उसके चौधरी बने हुए थे पर अब ये दल भी हमें आंखें दिखाने लगे हैं। यह भाकपा जिसका अपना कोई सिद्धान्त नहीं, जो सीटों और सत्ता के लिए चाहे जिस दल के साथ गठबंधन कर लेती है, अब सीटों के लिए हमसे झगड़ा करने लगी है। बंगाल में उसने गुरुदास दासगुप्त को राज्यसभा में दोबारा भेजने के लिए मंत्रिमण्डल छोड़ने तक की धमकी दे दी। पर वहां हम अड़े रहे, क्योंकि बंगाल विधानसभा में हमारी पार्टी को पूर्ण बहुमत प्राप्त था जबकि भाकपा के पास केवल छह सीटें थीं। वह सरकार से अलग हो जाती तो भी सरकार गिरने का भय नहीं था। इसलिए हमने उसकी धमकियों की परवाह नहीं की। उसे सीट नहीं दी। पांसकुड़ा के चुनाव मैदान में उससे तृणमूल के हाथों हरवाने में भी पर्दे के पीछे भूमिका निभायी। उल्टे उस पराजय के लिए मैंने ममता पर धांधली का आरोप लगा दिया। भला कौन इस बात पर वि·श्वास करता, शायद इसीलिए ज्योति बसु ने मेरी बात का खण्डन कर दिया कि उन्हें धांधली की जानकारी नहीं है। कम से कम उन्हें मेरी दाढ़ी की इज्जत का तो ख्याल करना चाहिए। इस पराजय से भाकपा के हौंसले बढ़े हैं। केरल में राज्यसभा की एक सीट के लिए वह अड़ ही गयी, वहां उसके पास 18 विधायक हैं, वहां वह सरकार गिराने की स्थिति में है। इसलिए हमें मन मारकर अपना उम्मीदवार हटाना पड़ा, सीट उसके लिए छोड़नी पड़ी। माक्र्सवाद की कसमें खाने वाले ये दल क्या अपनी नेता पार्टी के लिए एक सीट नहीं छोड़ सकते थे? क्या इससे दुनिया को यह पता नहीं चल गया कि माक्र्सवाद और वाममोर्चा एक ढकोसला मात्र है?

हमारा बूढ़ा शेर

इन छोटे-छोटे दलों को इतना भी ख्याल नहीं है कि भाजपा जैसे विशाल दैत्य को उसके मुंह पर गाली देने का साहस और कोई कम्युनिस्ट पार्टी दिखा पायी है? जरा याद कीजिए, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो हमारे बूढ़े शेर ज्योति बसु ने शालीनता और शिष्टाचार को त्यागकर उन्हें नमस्ते तक नहीं की, जब गृहमंत्री के नाते लालकृष्ण आडवाणी ने मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलानी चाही तो हमारे बूढ़े शेर ने गरजकर कहा कि मैं असभ्य और बर्बर आडवाणी के बुलावे को नहीं मानता। कितनी बहादुरी की बात है। भले ही हम पर कोई असभ्यता का आरोप लगाए पर इसी को हम अपनी बहादुरी समझते हैं। देखिए न, मई, 1999 में प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी कलकत्ता आए, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के गीतों के कैसेटों आदि का लोकार्पण करने, पर हमारा उपमुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य उनके साथ मंच पर नहीं बैठा, सभा में नहीं गया, क्योंकि माक्र्सवाद हमें यह इजाजत नहीं देता कि हम अपने विरोधी के साथ एक मंच पर बैठें। भले ही वह देश का प्रधानमंत्री क्यों न हो और अब दोबारा श्यामाप्रसाद मुखर्जी के जन्मदिवस पर आयोजित समारोह का भी हमारे बुद्धदेव भट्टाचार्य ने बहिष्कार किया। होंगे श्यामाप्रसाद मुखर्जी बंगाल के महान सपूत, भारत के श्रेष्ठ नेता पर हमारी माक्र्सवादी निष्ठा का तकाजा है कि हम राजनीतिक जीवन में छुआछूत और घृणा को असभ्यता की चरम सीमा तक ले जाएं। भले ही लोग यह मान बैठें कि असभ्यता का ही नाम माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी है।

सिद्धान्त से ऊपर सत्ता

घटते जनाधार का तकाजा है कि हम सपनों के आकाश से जमीन पर उतरें। 1964 में पार्टी विभाजन के बाद हल्दिया प्लेनम में संकल्प ले लिया था कि माकपा केवल उस गठबंधन सरकार में सम्मिलित होगी, जिसमें उसका निर्णायक वर्चस्व होगा। इसी संकल्प के कारण हमने 1996 में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर नहीं बढ़ने दिया। अगर उस समय पिछले दरवाजे से हम केन्द्र की सत्ता पर काबिज हो गए होते तो धांधली और सत्ता-तंत्र के उपयोग की अपनी कला का इस्तेमाल करके बंगाल का इतिहास वहां भी दोहराते। अब हमने अपनी भूल पहचान ली है और अप्रैल की बैठक में तैयार हुए कार्यक्रम में यह घोषणा कर दी है कि अब हम अल्पमत में होने पर भी किसी भी गठबंधन सरकार में सम्मिलित होने को तैयार हैं, क्या करें, जिन्दा रहने की मजबूरी सब कुछ करा लेती है। सिद्धान्त से ज्यादा बड़ी चीज है सत्ता और सत्ता पाने की रणनीति। पर कोई दल निमंत्रण देगा तभी तो हमें सत्ता में हिस्सा मिलेगा। नहीं देते तो भाड़ में जाएं सब दल। दाढ़ी और माक्र्स की कसम पार्टी को जिन्दा रखने के लिए मैं तो हर "ड्राइंगरूम' के चक्कर लगा रहा हूं, "डाइनिंगरूम' में घुस गया हूं। पर जनता है कि मेरी पार्टी को इतिहास के कूड़ेदान में फेंकने पर तुली हुई है। (13 जुलाई, 2000)

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