मिजोरम


रियांग के बाद

चकमाओं को भी प्रदेश से निकालने की साजिश

"यंग मिजो एसोसिएशन' (वाई.एम.ए.), जो यंग मैन क्रिश्चियन एसोसिएशन (वाई.एम.सी.ए.) का कथित संशोधित सेकुलर संस्करण है, ने मिजोरम में 1972 में गठित "चकमा स्वायत्तशासी जिला परिषद्' का विरोध किया है और इसे भंग करने की मांग की है। उल्लेखनीय है कि संविधान की छठी अनुसूची के प्रावधानों के तहत पूर्वोत्तर राज्यों में पर्वतीय जनजातियों को संरक्षण, विशेष अधिकार और सुरक्षा देने के उद्देश्य से इस परिषद् का गठन किया गया है। इस प्रकार स्वायत्तशासी जिला परिषद् एक संवैधानिक निकाय है। इन स्वायत्तशासी परिषदों को विशेष अधिकार प्राप्त हैं। अत: राज्य सरकार चाह कर भी चकमाओं के साथ रियांग जनजाति के प्रति दर्शाया अपना व्यवहार नहीं दोहरा सकती। आज 40 हजार से अधिक रियांग अपनी जान बचाने के लिए त्रिपुरा में शरण लिए हुए हैं। वाई.एम.ए. इस सच्चाई को जानता है। इसलिए उसने चकमा स्वायत्तशासी जिला परिषद् (सी.ए.डी.डी.) को समाप्त करने की मांग की है और इसके गठन को "ऐतिहासिक भूल' करार दिया है।

वाई.एम.ए. की इस मांग के विरुद्ध मिजोरम चकमा छात्र संघ के अध्यक्ष अनिल कांति चकमा और गुवाहाटी चकमा छात्र संघ के अध्यक्ष मलिन कुमार चकमा ने संयुक्त बयान जारी करके कहा है कि चकमा अनादि काल से दक्षिण मिजोरम के निवासी हैं। इसके पर्याप्त ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं। वाई.एम.ए. इन्हें विदेशी बता रहा है। किन्तु "सर्वे आफ मिजोरम' में कहा गया है कि चकमाओं के अलावा बर्मी, मिजो और अन्य ईसाई जनजातियां यहां निवास करती हैं। "एंथ्रोपोलिजिकल सर्वे आफ इंडिया' द्वारा प्रकाशित "पीपुल आफ इंडिया-मिजोरम' के पृष्ठ 46 पर लिखा है कि अंग्रेजों का चकमाओं के साथ प्रथम परिचय राजा भाग्य मानिक राय (1776-89) के समय में हुआ। उस समय दोनों के बीच टकराव चल रहा था। बाद में कालिंदी रानी (1844-1873) बनीं। कालिंदी रानी और हरीश चंद्र, दोनों ने लुसाइ जनजाति को अपने अधिकार में लेने में सहायता की। अंग्रेजों के प्रति सद्भावना दिखाने के नाते कालिंदी रानी के राज्य की सीमा का पुनर्निर्धारण कर राज्य के पूर्वी हिस्से, जिसे आज डेमागिरि (मिजो में टिला बंग) कहते हैं, को पूर्वी लुसाई हिल्स में मिला दिया गया। आजकल इसे मिजोरम कहते हैं।

"प्रोविंशयल गजेटियर आफ इंडिया', भाग- पांच के पृष्ठ 143 पर लिखा है कि "चकमा बहुल क्षेत्र डेमागिरि पहले लुसाई हिल्स में स्थित नहीं था। भौगोलिक दृष्टि से यह "चिटगांव हिल ट्रैक्ट्स' का हिस्सा है।' किन्तु 1892 में सर चाल्र्स इलियट ने आदेश पारित कर घोषित किया कि "प्रशासकीय कार्यों के लिए डेमागिरि को लुसाई हिल्स का हिस्सा माना जाए।' सीमा का पुनर्निर्धारण हुआ, डेमागिरि सहित पूरब की पट्टी को 1500 लोगों की आबादी सहित लुसाई हिल्स को हस्तांतरित कर दिया गया। इस प्रकार चकमा इस क्षेत्र के स्वाभाविक नागरिक बन गए।

उल्लेखनीय है कि मिजोरम के केन्द्र शासित प्रदेश बनने से पूर्व यह असम का एक जिला था और इसका नाम लुसाई हिल्स था। मिजोरम में उग्रवाद की शुरुआत के बाद इसका नाम बदल कर "मिजोरम' कर दिया गया। मिजो लोगों की जनसंख्या अधिक होने के कारण इनका बोलबाला हो गया। किन्तु यहां अन्य जनजातियां-रियांग, चकमा, मार आदि भी हैं। अब मिजो लोग अपना दबदबा बढ़ाने के लिए तमाम गैर मिजो जनजातियों को निकालने की नीति पर अमल कर रहे हैं। पहले रियांगों को निकाला, अब चकमाओं की बारी है। मिजो प्रभुत्व वाला प्रशासन भी निष्क्रिय रहकर उनको सहयोग दे रहा है।

द प्रतिनिधि

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