वामपंथी इतिहासकारों ने नहीं सुलझने दिया राम मंदिर मामला’ : केके मोहम्मद
   दिनांक १४-अप्रैल-२०१८
बरसों पहले ही इस मुद्दे को सुलझ जाना चाहिए था, मुस्लिम भी जमीन पर हटने के लिए थे राजी

 
राम मंदिर मामले पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई जारी है। राम मंदिर का यह मसला अब से 40 बरस पहले की सुलझ सकता था लेकिन नहीं सुलझा। दिल्ली विश्वविद्यालय में एक डिबेट के दौरान उत्तरप्रदेश  शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने कहा भी कि हठधर्मी खत्म करके वहां राम मंदिर बनने देना चाहिए और इसमें स्वयं सहयोग करना चाहिए।
राम का जन्म कहां हुआ यह सिर्फ हिंदू तय करेंगे न की मुसलमान। अगर हिंदू यह कहते हैं अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनना चाहिए तो वह बनना चाहिए।
दिल्ली यूनिवर्सिटी नॉर्थ कैंपस में न्यू भारत फाउंडेशन की ओर से राम मंदिर पर आयोजित एक डिबेट में उन्होंने कहा कि मुसलमान इस बात को भी अच्छी तरह जानते हैं कि ऐसी जगह नमाज नहीं पढ़ी जा सकती जो जगह आपकी न हो, या वह किसी से छीनी गई हो। जब इस्लाम में ऐसी जगह पर नमाज जायज नहीं है तो फिर मस्जिद कैसी ?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में उत्तर क्षेत्र के पूर्व निदेशक डॉ. केके मोहम्मद ने पाञ्चजन्य से हुई विशेष बातचीत में बताया 1976-77 में जब डॉ. बीबी लाल के नेतृत्व में वहां खुदाई की गई तो नीचे 12 मंदिरों के स्तंभ थे। वे मंदिर के थे क्योंकि मस्जिदों में ऐसे स्तंभ और वैसी नक्काशी नहीं होती। खुदाई के दौरान मूर्तियां भी निकली।
वह कहते हैं कि 14 दिसंबर 1990 को मैंने इंडियन एक्सप्रेस को साक्षात्कार दिया था। अगले दिन 15 दिसंबर को वह प्रकाशित हुआ। उस समय मैं चेन्नै में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में था। मैंने तब विस्तार से बताया था कि खुदाई में क्या-क्या निकला।
मंदिर के 12 स्तंभ निकले थे खुदाई में
मोहम्मद बताते हैं कि खुदाई करने के15 दिनों बाद उस जगह से मंदिरों के 12 स्तंभ मिले थे जिनके गुंबद 11वीं और 12वीं शताब्दी के मंदिरों में मिलते हैं. इसके अलावा गुंबद में9 ऐसे चिन्ह मिले थे जो मंदिर होने का सबूत देते थे। जैसे विष्णु हरि शिला फलक, मंदिरों के गर्भगृह से निकले वाले मकर प्रणाली के स्तभं, छोटी-छोटी मूर्तियां। ये सब बातें यह साबित करने के लिए काफी हैं कि वहां भगवान श्रीराम का ही मंदिर था
राजी थे मुसलमान पर वामपंथियों ने नहीं सुलझने दिया मुद्दा
केके मोहम्मद कहते हैं इरफान हबीब और रोमिला थापर जैसे वापमंथी इतिहासकारों ने मसले को नहीं सुलझने दिया। मुसलमान तब जमीन पर अपना हक छोड़ने के लिए राजी थे लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने उनका ब्रेनवाश कर दिया। इस कारण जो मुद्दा बरसों पहले सुलझ सकता था वह नहीं सुलझा।