आज की चुनौतियां तब भांप ली थीं बाबासाहेब ने
   दिनांक १३-अप्रैल-२०१८
यह देखकर आश्चर्य होता है कि आज की परिस्थितियों और स्वतंत्र भारत के सामने पेश चुनौतियों का उस समय बाबासाहेब को कितना वास्तविक अनुमान हो गया था। आज जब वामपंथी गुट छद्म रूप से उनकी विचारधारा और अनुयायियों को विपरीत दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे, ऐसे में उनके विचारों का स्मरण ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाता है।
 
 
 
भारत का संविधान बनाने में दो साल से भी अधिक समय लगा और 26 नवम्बर,1949 को यह काम पूरा हुआ। इस कार्य में स्वाधीनता आंदोलन में तपे 300 नेता मतभेद भुलाकर नवभारत के निर्माण के लिए एकत्र हुए थे। हर व्यक्ति ने अपना सर्वोत्तम योगदान देने का प्रयास किया। इस लंबे विचार मंथन के बाद डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 25 नवम्बर, 1949 को जो भाषण दिया, वह स्वतंत्र भारत के सर्वोत्कृष्ट भाषणों में से एक माना जाता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचार प्रवाह से बाबासाहेब के विचारों की समानता अद्भुत है। यह देखकर और भी आश्चर्य होता है कि आज की परिस्थितियों और स्वतंत्र भारत के सामने पेश चुनौतियों का उस समय उन्हें कितना वास्तविक अनुमान हो गया था। आज जब विविध वामपंथी गुट छद्म रूप से उनकी विचारधारा और अनुयायियों को विपरीत दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे, ऐसे में उनके विचारों का स्मरण ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाता है।

बाबासाहेब कहते हैं, '' संविधान जितना भी अच्छा हो, वह बुरा साबित हो सकता है, यदि उसका अनुसरण करने वाले लोग बुरे हों। एक संविधान चाहे जितना बुरा हो, वह अच्छा साबित हो सकता है, यदि उसका पालन करने वाले लोग अच्छे हों। लोकमन संस्कार करना परमगति साधना है।'' ऐसा मानने और जनमानस को राष्ट्रभक्ति से प्रेरित किए बिना इस देश में स्थायी परिवर्तन नहीं आएगा, यह विचार रखने वाले सामाजिक संगठनों से क्या यह विचार अलग है? लोग अच्छे हों, तो देश की सभी संविधानिक रचनाएं और अच्छी बनेंगी, ऐसा मानकर व्यक्ति निर्माण कार्य में लगी भारत की सज्जनशक्ति क्या बाबासाहेब के विचारों पर नहीं चल रही है?

क्या भारत दूसरी बार स्वतंत्रता खो देगा?

बाबासाहेब कहते हैं, ''यह बात नहीं है कि भारत कभी स्वतंत्र देश नहीं था। विचार बिंदु यह है कि जो स्वतंत्रता उसे उपलब्ध थी, उसे उसने एक बार खो दिया था। क्या वह उसे दूसरी बार खो देगा? यह विचार मुझे भविष्य को लेकर बहुत चिंतित कर देता है। यह तथ्य मुझे और भी व्यथित करता है कि न केवल भारत ने पहले एक बार स्वतंत्रता खोई है,बल्कि अपने ही कुछ लोगों के विश्वासघात के कारण ऐसा हुआ है। सिंध पर जब मुहम्मद-बिन-कासिम का हमला हुआ तो राजा दाहिर के सैन्य अधिकारियों ने उसके दलालों से रिश्वत लेकर अपने राजा के पक्ष में लड़ने से इनकार कर दिया था। वह जयचंद ही था, जिसने मुहम्मद गोरी को भारत पर हमला करने और पृथ्वीराज चौहान से लड़ने के लिए आमंत्रित किया था तथा उसे अपनी एवं सोलंकी राजाओं की मदद का आश्वासन दिया था। जब शिवाजी हिंदुओं की मुक्ति के लिए लड़ रहे थे, तब कई मराठा सरदार और राजपूत राजा मुगल शहंशाह की ओर से लड़ रहे थे। जब ब्रिटिश सिख शासन को समाप्त करने की कोशिश कर रहे थे तो उनका मुख्य सेनापति गुलाबसिंह चुप रहा और सिख राज्य को बचाने में उनकी मदद नहीं की। 1857 में जब देश के एक बड़े हिस्से में ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वातंत्र्य युद्ध की घोषणा हुई तब सिख इन घटनाओं को मूक दर्शक की तरह देखते रहे।''

यहां बाबासाहेब किस भारत का वर्णन कर रहे हंै? वह कौन सा भारत है जिसने अपनी स्वतंत्रता खो दी थी? अगर भारत 'नेशन इन द मेकिंग' होता, जैसा कि इस देश कीसेकुलर सोच ने स्थापित करने का प्रयास किया, तो उसकी स्वतंत्रता खोने का प्रश्न ही नहीं है। बाबासाहेब का इशारा उसी भारत की ओर है, जो सदियों से राष्ट्र के रूप में कायम है। अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारंभ से लेकर अंत तक बाबासाहेब भारत की प्राचीन और मूलभूत एकता के विचार पर अडिग रहे। 1916 में अमेरिका में एक सेमिनार में 'कास्ट्स इन इंडिया: देयर मेकेनिज्म, जेनेसिस एंड डेवेलपमेंट' विषय पर कहते हैं, ''वंश की दृष्टि से तो लोग विभिन्न वंशी हो सकते हैं, पर सांस्कृतिक एकता ही एकता का मूल आधार होता है। दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जिसकी सांस्कृतिक एकता की तुलना भारतीय उपखंड से की जा सके। यहां केवल भौगोलिक एकता नहीं है, उससे इतर एक स्पष्ट मूलभूत सांस्कृतिक एकता है जो इस सम्पूर्ण भूमि को आच्छादित करती है।''

खून की आखिरी बूंद तक स्वतंत्रता की रक्षा करनी है

आज जेएनयू के सुरक्षित परिसर में 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' कहते हुए नाचने वाले और उन्हें नचाने वाली शक्तियां क्या बाबासाहेब के इन विचारों से सहमत हैं? बाबासाहेब कहते हैं, ''क्या इतिहास स्वयं को दोहराएगा? इसका अहसास होने के बाद यह चिंता और भी गहरी हो जाती है कि जाति और पंथ के रूप में पुराने शत्रुओं के अलावा यहां विरोधी विचारधाराओं वाले राजनीतिक दल होंगे। क्या भारतीय देश को अपने मताग्रहों से ऊपर रखेंगे या उन्हें देश से ऊपर समझेंगे? मैं नहीं जानता, परंतु यह तय है कि यदि पार्टियां अपने मताग्रहों को देश से ऊपर रखेंगी तो हमारी स्वतंत्रता संकट में पड़ जाएगी और संभवत: वह हमेशा के लिए खो जाए। हम सबको दृढ़ संकल्प के साथ इस संभावना से बचना है। हमें अपने खून की आखिरी बूंद तक अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी है। यह बात नहीं है कि भारत ने कभी प्रजातंत्र को जाना ही नहीं। एक समय था, जब भारत गणतंत्रों से भरा हुआ था और जहां राजसत्ताएं थीं, वहां भी या तो वे निर्वाचित थीं या सीमित। वे कभी भी निरंकुश नहीं थीं। भारत ने यह प्रजातांत्रिक प्रणाली खो दी। क्या वह दूसरी बार उसे खोएगा? मैं नहीं जानता, परंतु भारत जैसे देश में यह बहुत संभव है जहां लंबे समय से उसका उपयोग न किए जाने को उसे एक बिल्कुल नई चीज समझा जा सकता है कि तानाशाही प्रजातंत्र का स्थान ले ले। इस नवजात प्रजातंत्र के लिए यह बिल्कुल संभव है कि वह आवरण प्रजातंत्र का बनाए रखे, परंतु वास्तव में वह तानाशाही हो।''

चेतावनी सही साबित हुई

यह चेतावनी कितनी सही निकली है, यह भारत का आगे का इतिहास बताता है। किसी समय भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के शीर्ष पर रही कांग्रेस ने आगे चलकर जब सत्ता खोने का समय आ गया तो आपातकाल लादकर देश के लोकतंत्र को ही खतरे में डाला। वोट की राजनीति के लिए अल्पसंख्यक-अनुनय की परिसीमा की, शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को भी बहुमत के आधार पर बदलकर महिला अधिकारों का हनन किया। तब से लेकर आज की कर्नाटक सरकार के 'लिंगायत हिन्दू नहीं हैं' घोषित करने तक, हमें यही दिखाई देता है कि कांग्रेस और उसके प्रभाव में आकर अन्य अनेक पार्टियों ने हमेशा तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थ के लिए अपने मताग्रहों को देशहित से ऊपर रखा।

प्रजातंत्र बचाए रखने के लिए तीन सीख

प्रजातंत्र को बचाए रखने के लिए बाबासाहेब ने तीन बातों को रेखांकित किया। वे कहते हैं, ''प्रजातंत्र को केवल बाह्य स्वरूप में ही नहीं, बल्कि वास्तव में बनाए रखने के लिए हमें,मेरी समझ से, सबसे पहले अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निष्ठापूर्वक संवैधानिक उपायों का ही सहारा लेना चाहिए। इसका अर्थ है, हमें क्रांति का खूनी रास्ता छोड़ना होगा।'' आज देश में एक अजीब-सा गठजोड़ बनाने के प्रयास चल रहे हैं। शहरी माओवाद अनुसूचित जाति समुदाय की समस्याओं के आवरण में हिंसात्मक तरीके से आन्दोलन चलाने का प्रयास करता दिखाई दे रहा है। महाराष्ट्र में कोरेगांव भीमा के लिए हुई यलगार परिषद, जिसके पीछे कई अतिवादी वामपंथी थे, हाल ही में हुए भारत बंद के दौरान उभरी हिंसा आदि घटनाक्रम स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि अनुसूचित जातियों के युवाओं को बाबासाहेब के विचारों से दूर ले जाने के प्रयास चल रहे हैं। अपने पूरे जीवन में वामपंथियों के घोर विरोधी रहे बाबासाहेब की यह चेतावनी कितनी दूरदृष्टिपूर्ण थी, यह आज ध्यान में रखने की आवश्यकता है।
बाबासाहेब कहते हैं, ''दूसरे, हमें जॉन स्टुअर्ट मिल की उस चेतावनी को ध्यान में रखना चाहिए, जो उन्होंने उन लोगों को दी है, जिन्हें प्रजातंत्र को बनाए रखने में दिलचस्पी है। वह यह कि अपनी स्वतंत्रता को एक महानायक के चरणों में भी समर्पित न करें या उस पर विश्वास करके उसे इतनी शक्तियां प्रदान न कर दें कि वह संस्थाओं को नष्ट करने में समर्थ हो जाए। धर्म के क्षेत्र में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है, परंतु राजनीति में भक्ति या नायक-पूजा पतन और अंतत: तानाशाही का सीधा रास्ता है।'' अर्थात् बाबासाहेब का तात्पर्य था कि व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, व्यक्तिवाद या व्यक्तिपूजा में लोकतंत्र की हानि है। उस समय कांग्रेस इस इशारे की ओर ध्यान देती तो अच्छा होता, वह न होने के कारण स्वयं कांग्रेस भी आज एक परिवार की गुलामी में ही तो सिमट गई है।

आखिर में वे कहते हैं, ''तीसरी बात है, मात्र राजनीतिक प्रजातंत्र पर संतोष न करना। हमें राजनीतिक प्रजातंत्र को एक सामाजिक प्रजातंत्र भी बनाना चाहिए। जब तक उसे सामाजिक प्रजातंत्र का आधार न मिले, राजनीतिक प्रजातंत्र चल नहीं सकता।''
राजनीतिक प्रजातंत्र पर संतोष न करने, सामाजिक प्रजातंत्र को बल देने का अर्थ है कि राजनीति से परे जाकर सामाजिक समरसता के लिए कार्य करने वाले संगठनों और संस्थाओं को बल प्रदान करना। समाज के अभावग्रस्त तबकों में सामाजिक आंदोलनों, सेवा कार्यों के माध्यम से, सेवाभावी व्यक्ति एवं संस्थाओं की पहल से शिक्षा, रोजगार के अवसर प्रदान करने की सशक्त पहल करना। स्वतंत्रता के बाद के काल में, इस देश की मूलभूत एकता पर अडिग विश्वास रखते हुए देश में सामाजिक प्रजातंत्र लाने का यह कार्य निरंतर निस्वार्थ भाव से करने वाले लोग, संगठन और आंदोलन ही वास्तव में बाबासाहेब के विचारों की विरासत को सबसे अधिक समझते हैं।