२४ जून २०१२
           
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एक से एक रणछोड़"

एक से एक रणछोड़

तारीख: 6/16/2012 2:51:58 PM

एक से एक रणछोड़

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह सदन की सदस्यता का पिछला रास्ता ही चुना। मनमोहन को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री बने सात साल हो गये, पर आज तक कहीं से भी लोकसभा का चुनाव लड़ने का साहस नहीं जुटा पाये। नतीजतन उस असम से राज्यसभा सदस्य बने हुए हैं, जिससे उनका कभी दूर-दूर तक का संबंध नहीं रहा। बेशक अखिलेश वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में एक नहीं, दो-दो सीटों, फिरोजाबाद और कन्नौज से लोकसभा के लिए चुने गए थे। संविधान के मुताबिक एक ही सीट का प्रतिनिधित्व किया जा सकता है, सो उन्होंने फिरोजाबाद की सीट छोड़कर वहां से अपनी पत्नी डिम्पल को लोकसभा भेजना चाहा, लेकिन मतदाताओं ने परिवारवाद के विस्तार की इस पराकाष्ठा के मंसूबे पर पानी फेरते हुए कांग्रेस के टिकट पर फिल्म अभिनेता राज बब्बर को जिता दिया, जिन्हें कुछ ही महीने पहले पड़ोसी फतेहपुर सीकरी के मतदाताओं ने नकार दिया था। विधानसभा में जबर्दस्त बहुमत के बावजूद मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश ने विधान परिषद की सदस्यता का सुरक्षित विकल्प चुना और इस बार भी अपने इस्तीफे से खाली हुई कन्नौज सीट के लिए डिम्पल को मैदान में उतार दिया, पर इस बार नजारा एकदम बदल गया। सबसे पहले तो वह कांग्रेस रणछोड़ बनी जिसकी सरकार बनने का सपना तीन महीने पहले तक 'युवराज' उत्तर प्रदेश में घूम घूमकर बेच रहे थे। फिर वह बहुजन समाज पार्टी भी चुनाव मैदान छोड़ गयी, जो तीन महीने पहले तक उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ थी और आज भी मुख्य विपक्षी दल है। भाजपा के साथ जो हुआ, वह तो वाकई कमाल था। पार्टी ने उम्मीदवार तो तय कर लिया, पर वह निर्धारित समय अवधि में नामांकन दाखिल करने ही नहीं पहुंच सका। फिर निर्दलियों की क्या बिसात कि डिम्पल के मुकाबले टिकते। सो, वह निर्विरोध लोकसभा के लिए चुन ली गयीं। जाहिर है, सपाइयों में जश्न का माहौल है, पर लोकतंत्रवादी क्या करें?

सत्ता के सौदागर

दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी की गिनती सत्ता के चर्चित सौदागरों में होती है। उनके कहने से देश के कितने मुसलमान वोट डालते हैं, यह तो विवाद का विषय है, पर हर चुनाव से पहले उनका दरबार अवश्य सज जाता है। इस बार भी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले यही हुआ। आखिर देश के इस सबसे बड़े राज्य में लगभग एक चौथाई सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक स्थिति में जो हैं। हालांकि मुसलमानों को समाजवादी पार्टी के पक्ष में गोलबंद करने में बसपा-भाजपा की संभावित मित्रता संबंधी दुष्प्रचार ने ही निर्णायक भूमिका निभायी, पर बुखारी की दुकान चल पड़ी है, क्योंकि चुनाव से पहले ही उन्होंने सपा को समर्थन का ऐलान कर दिया था। चुनाव में तो उनके दामाद बुरी तरह हार गये, पर उसके बाद भी वह मुसलानों के नाम पर सत्ता में हिस्सेदारी मांगते रहते हैं, पर किन मुसलमानों के लिए, यह जानना दिलचस्प है। ताजा मसाला मलाईदार समझे जाने वाले उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष पद का है। अखिलेश सरकार ने इस पद पर दिल्ली के एक बिल्डर वसीम अहमद खान की नियुक्ति की है। वसीम बुखारी के करीबी तो हैं ही, मनमोहन सिंह सरकार के एक चर्चित मंत्री की पत्नी के साथ मांस निर्यात के कारोबार में साझीदार भी हैं। अब आप हिसाब लगाते रहिए कि सत्ता के सौदागरों के तार कहां से कहां जुड़ते हैं।

छोटे चौधरी की छटपटाहट

पहले किंगफिशर का आर्थिक संकट और फिर एयर इंडिया के पायलटों की हड़ताल। किसान नेता से नागरिक उड्डयन मंत्री बने राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख अजित सिंह लगातार चर्चा में हैं। कोई उनके कड़े रुख की तारीफ कर रहा है तो कोई उसके पीछे के निहितार्थ तलाशने की कोशिश कर रहा है, पर इस सबसे इतर छोटे चौधरी की राजनीतिक छटपटाहट का अहसास किसी को नहीं है। मुलायम सिंह यादव की पिछली सरकार में उत्तर प्रदेश में रालोद भी भागीदार था। सत्ता की मलाई में भी उसका अच्छा-खासा हिस्सा था, लेकिन वर्ष 2007 के विधानसभा चुनावों से पहले ही कांग्रेस ने अजित को गठबंधन और केन्द्र में मंत्री पद का लॉलीपॉप दिखा कर रालोद को सपा से अलग करा दिया। लंबे इंतजार के बाद वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों से कुछ ही पहले जाकर वह गठबंधन हो पाया और अजित मंत्री बन पाये, लेकिन चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस की मुलायम से नजदीकियों ने उनकी छटपटाहट बढ़ा दी है। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि कांग्रेस-सपा की बढ़ती नजदीकियों के बीच उनके लिए जगह कहां और कितनी बचेगी।


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