माता गुरुतरा भूमे: खात् पितोच्चतरस्तथा
माता का गौरव पृथ्वी से भी अधिक है। पिता आकाश से भी ऊंचा है। -वेदव्यास (महाभारत, वनपर्व,313/60)
मनुष्य का अहंकार ऐसा है कि प्रासादों का भिखारी कुटी का अतिथि-देवता भी बनना स्वीकार नहीं करेगा।
-महादेवी वर्मा (दीपशिखा, चिन्तन के कुछ क्षण)