१५ जुलाई २०१२
           
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दिल्ली को ‘असम’ बनाने का षड्यन्त्र

म्यांमार के मुस्लिमों के नाम पर बंगलादेशी घुसपैठियों को शरणार्थी का दर्जा दिलाने का प्रयास

अरुण कुमार सिंह

भारत में ही रहकर भारत-विरोधी तत्व किस प्रकार के देश-विरोधी कार्य कर रहे हैं, इसका एक नमूना सामने आया है।ये तत्व गत दिनों लगभग 2500 लोगों को लेकर नई दिल्ली के वसन्त विहार स्थित यूनाइटेड नेशन्स हाई कमिश्नर फार रिफ्यूजी (यू.एन.एच.सी.आर.) के दफ्तर के सामने पहुंचे। यूएनएचसीआर के अधिकारियों को बताया गया कि ये लोग म्यांमार के नॉदर्न रेखिन स्टेट से आए हैं और रेयांग मुस्लिम हैं। म्यांमार की सरकार ने इन लोगों को वहां से खदेड़ दिया है। इसलिए ये लोग वाया बंगलादेश भारत आए हैं, इन्हें शरणार्थी का दर्जा दिया जाए। इस मांग के साथ ये सभी लोग वसन्त विहार की सड़कों और पार्कों पर कब्जा करके कई दिन तक जमे रहे। उनकी हरकतों से स्थानीय निवासी परेशान हो गए और उन्होंने सभी लोगों को वसन्त विहार से बाहर करने की मांग की। इसके बाद 6 मई को दिल्ली के कुछ मुस्लिम नेता और मुल्ला-मौलवियों की शह पर प्रशासन ने उन सभी लोगों को वसन्त कुंज के पास रंगपुरी पहाड़ी पर रातों-रात पहुंचा दिया। यहां एक धार्मिक स्थल "दादा भैया' है। स्थानीय हिन्दुओं में इस स्थल की बड़ी मान्यता है। पहाड़ी पर एक पुरानी मजार भी है। "दादा भैया' स्थल को उन लोगों ने अपवित्र करना शुरू कर दिया। वहीं मांसाहारी भोजन बनने लगा और फिर नमाज भी पढ़ी जाने लगी। इस कारण आसपास के गांवों (नांगल देवत, महिपालपुर, रंगपुरी, मसूदपुर, किशनगढ़, घिटोरनी, महरौली, कटवारिया सराय, रजोकरी, कापसहेड़ा आदि) के लोग भी भड़क गए। ग्रामीणों ने अनेक पंचायतें कर प्रशासन को चेतावनी दी कि पहाड़ी से उन मुस्लिमों को हटाया जाए, नहीं तो गांव वाले आन्दोलन शुरू कर देंगे। इस सम्बंध में ग्रामीणों के एक प्रतिनिधिमण्डल ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से भी भेंट की। चौतरफा दबाव के कारण प्रशासन ने उन मुस्लिमों को 15 मई को रंगपहाड़ी से हटा दिया। उनमें से कुछ लोग जम्मू गए, तो कुछ लोग उ.प्र. के मुस्लिम-बहुल जिलों मुजफ्फरनगर, रामपुर, मेरठ, अलीगढ़ की ओर कूच कर गए। कुछ दिल्ली में ही रह गए। उन लोगों के लिए ओखला क्षेत्र के मदनपुर खादर में कुछ मुस्लिम संगठनों ने आशियाना बनाने की बात कही है।

सोची-समझी साजिश


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नई दिल्ली में यूएनएचसीआर कार्यालय के बाहर यूं जमे थे मुस्लिम

यहां सवाल उठता है कि बिना किसी कागजात के अवैध तरीके से भारत आए मुस्लिमों को देश से बाहर करने के बजाय उन्हें भारत के ही विभिन्न स्थानों पर क्यों जाने दिया गया? इसका जवाब वह भारत सरकार कभी नहीं देगी, जो लुट-पिटकर पाकिस्तान से भारत आए बेचारे हिन्दुओं को खदेड़ने के लिए सदैव तैयार रहती है। रंग पहाड़ी के आसपास के ग्रामीणों का कहना था, "जिन मुस्लिमों को म्यांमार का बताकर भारत में शरणार्थी का दर्जा दिलाने की कोशिश की जा रही है, उनकी पहचान संदिग्ध है। उनमें एकाध प्रतिशत जरूर म्यांमार के हो सकते हैं, पर उनमें से अधिकांश बंगलादेशी लगते हैं। वे शक्ल, बोलचाल और पहनावे से म्यांमारी कम, बंगलादेशी अधिक लगते हैं। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि उनमें से एक के पास भी ऐसा कोई कागज नहीं है, जो साबित करे कि वे म्यांमार के हैं। उन लोगों का कहना है कि म्यंमार में उनका साढ़े तीन सौ साल पुराना इतिहास है। फिर भी उन्हें वहां की सरकार

अपना नागरिक नहीं मानती है। क्या ऐसा हो सकता है? इसका अर्थ यह है कि वे लोग म्यांमार के नहीं, बंगलादेश के हैं। चूंकि भारत में किसी बंगलादेशी या पाकिस्तानी को शरणार्थी का दर्जा नहीं मिल सकता है इसलिए वे लोग अपने को म्यांमार का निवासी बताकर भारत में शरणार्थी का दर्जा प्राप्त करना चाहते हैं।

यह सब कुछ एक सोची-समझी साजिश के तहत हो रहा है। इस साजिश में भारत के अनेक मुस्लिम नेता और मुल्ला-मौलवी शामिल हैं। ऐसे ही बंगलादेशी घुसपैठियों के कारण अब अनेक स्लम नेता यह दावा करने लगे हैं कि कुछ ही साल बाद असम में कोई मुस्लिम ही मुख्यमंत्री होगा।

 जिन मुस्लिमों को शरणार्थी का दर्जा दिलाने के लिए दिल्ली लाया गया था, उनके बारे में कहा जा रहा है कि वे 4-5 साल से भारत के विभिन्न हिस्सों में रह रहे हैं और इनकी संख्या 80 हजार के करीब है। मुजफ्फरनगर, जम्मू आदि शहरों में रहने वाले इन मुस्लिमों को स्थानीय मुस्लिमों का पूरा समर्थन प्राप्त है। चूंकि न्यायालय के आदेश पर कभी-कभार पुलिस बंगलादेशी घुसपैठियों को पकड़ती है। शायद इसलिए अब जो बंगलादेशी मुस्लिम चोरी-छिपे भारत आ रहे हैं, वे पुलिस से बचने के लिए शरणार्थी का दर्जा प्राप्त करना चाहते हैं।

मददगारों की जांच हो

यूएनएचसीआर कार्यालय के अनुसार इन मुस्लिमों ने सबसे पहले 2009 में शरणार्थी का दर्जा पाने के लिए आवेदन किया था। मार्च 2012 तक ऐसे 2000 मुस्लिमों को शरणार्थी का दर्जा मिल चुका है। इस बार भी एक साथ 2000 मुस्लिमों ने शरणार्थी-कार्ड प्राप्त करने के लिए आवेदन किया था। इन मुस्लिमों के सलाहकारों की सोच यह थी कि एक साथ हजारों लोग आवेदन लेकर यूएनएचसीआर दफ्तर पहुंचेंगे तो सरकार पर दबाव बनेगा और इन मुस्लिमों को एक झटके में शरणार्थी का दर्जा मिल जाएगा। पर इस साजिश में वे सफल नहीं हुए। स्थानीय लोगों के विरोध के कारण प्रशासन को उन मुस्लिमों को दिल्ली से

बाहर करना पड़ा। इस विरोध को देखते हुए यूएनएचसीआर ने भी इतने लोगों को एक साथ शरणार्थी का दर्जा देने से मना कर दिया। विश्व हिन्दू परिषद् के अन्तरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष डा. प्रवीण भाई तोगड़िया ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि इन मुस्लिमों को किसी भी सूरत में शरणार्थी का दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए। क्योंकि इनके संबंध जिहादी गुटों से हैं। डा. तोगड़िया ने यह भी मांग की है कि इन मुस्लिमों के स्थानीय मददगारों की जांच कर उन्हें दण्डित किया जाना चाहिए और जो संगठन इनकी मदद कर रहे हैं उन पर प्रतिबंध लगे। इस संबंध में भाजपा सांसद बलबीर पुंज ने एक अच्छा सवाल उठाया कि इन मुस्लिमों को यूएनएचसीआर कार्यालय तक कौन लोग लाए, उसकी जांच होनी चाहिए। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने इसकी जांच का आश्वासन तो दिया है पर चिदम्बरम की मानसिकता को देखते हुए जांच की कम ही उम्मीद है।

 

ऐसे होते हैं सेकुलर

शरणार्थी का दर्जा मांगने वाले इन मुस्लिमों के संबंध में 15 मई को वसन्त विहार स्थित यूएनएचसीआर के कार्यालय में पत्रकारों और कुछ अन्य लोगों को कुछ औपचारिक जानकारी दी गई। एक पत्रकार ने यूएनएचसीआर की एक महिला पदाधिकारी से पूछा कि पाकिस्तानी हिन्दुओं को शरणार्थी का दर्जा क्यों नहीं दिया जाता है? तो एक चैनल की महिला पत्रकार चिढ़ गई। उसने कहा यह क्या फालतू सवाल पूछ रहे हो। यानी हिन्दुओं से जुड़ा कोई सवाल पूछने पर भी सेकुलर अपनी चिढ़ नहीं छिपा पा रहे हैं। इससे पता चलता है कि हिन्दुओं के प्रति सेकुलरों में कितनी नफरत है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएच.डी. कर रही एक युवती तो इस बात पर उलझ गई कि उन मुस्लिमों को शरणार्थी का दर्जा क्यों नहीं दे रहे हैं? जब एक ने उससे पूछा कि ऐसी मांग आप उन बेचारे पाकिस्तानी हिन्दुओं के लिए क्यों नहीं करती हो, जो दिल्ली में खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं? तो उन्होंने कहा मुझे नहीं पता कोई पाकिस्तानी हिन्दू दिल्ली में रह रहा है। शायद सेकुलरों को कोई दुखिया हिन्दू दिखाई ही नहीं देता है।

यूएनएचसीआर' और हिन्दू

"यूएनएचसीआर' संयुक्त राष्ट्र संघ की एक इकाई है, जो दुनियाभर में दफ्तर खोलकर बैठी है। हालांकि मुस्लिम देशों में इसका न के बराबर वजूद है। इसका काम है किसी देश में कम संख्या में आए शोषित और पीड़ित विदेशियों को शरणार्थी का दर्जा देना। किसी देश में बड़ी संख्या में आने वाले पीड़ित विदेशियों को शरणार्थी का दर्जा देने का अधिकार वहां की सरकार के पास होता है। जैसे भारत सरकार ने तिब्बतियों को शरणार्थी का दर्जा दे रखा है। हजार-दो हजार विदेशियों को किसी देश में शरणार्थी का दर्जा यूएनएचसीआर देती है। यूएनएचसीआर संबंधित देश की सरकार के दिशा-निर्देश पर काम करती है। यानी किस देश से आने वाले लोगों को शरणार्थी का दर्जा मिलेगा, यह संबंधित देश की सरकार तय करती है। भारत स्थित यूएनएचसीआर को हिदायत है कि वह भारत के पड़ोसी देशों से आने वाले लोगों को शरणार्थी का दर्जा न दे। शायद भारत सरकार ने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि भारत के दो प्रमुख पड़ोसी देशों पाकिस्तान और बंगलादेश से प्रताड़ित होकर भारत आने वालों में मुख्य रूप से हिन्दू हैं। यही कारण है कि 1971 में या उसके बाद बंगलोदश से जो हिन्दू भारत आए हैं, उन्हें अभी तक शरणार्थी का दर्जा नहीं मिल पाया है। यही हाल उन प्रताड़ित पाकिस्तानी हिन्दुओं का भी है, जो बड़ी आस के साथ भारत में शरण लेने आते हैं। पर उन्हें शरणार्थी का दर्जा नहीं मिल पाता है। जबकि भारत में यूएनएचसीआर के माध्यम से 22 हजार लोगों को शरणार्थी का दर्जा मिला हुआ है। इनमें अफगानिस्तान, सोमालिया, मलेशिया, कांगो, ईरान, इराक, म्यांमार आदि देशों के लोग शामिल हैं। यूएनएचसीआर भारत में किसी विदेशी को शरणार्थी का दर्जा बड़ी आसानी से दे देती है। शरणार्थी का दर्जा मांगने वाले किसी भी विदेशी से यूएनएचसीआर चार-पांच सवाल करती है और उसी आधार पर उसे भारत में शरणार्थी का दर्जा दे देती है। यह बहुत ही गलत तरीका है। जिसको शरणार्थी का दर्जा दिया जाए उसकी अच्छी तरह जांच होनी चाहिए। किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा है।

 

 

 



60 की संसद, साख का संकट


undefined1953 में संसद सचिवालय से जुड़े देश के मूर्धन्य संविधानविद् डा. सुभाष कश्यप 1984 से 1990 तक 7वीं, 8वीं, 9वीं लोकसभा के महासचिव रहे। संसदीय कार्य प्रणाली, भारतीय संविधान और संसदीय लोकतंत्र के मर्मज्ञ डा. कश्यप ने भारतीय संसद के स्वरूप को उत्तरोत्तर नए आयामों में ढलते देखा है। लोकसभा की पहली बैठक को 60 साल पूरे होने पर पाञ्चजन्य के साथ यादों की डगर को खंगालते हुए उन्होंने संसदीय लोकतंत्र, संविधान और संसद के चेहरे, चरित्र और चलन का विश्लेषण किया। यहां प्रस्तुत हैं उनसे हुई विस्तृत चर्चा के संपादित अंश। -सं.

आलोक गोस्वामी

आजादी मिलने के बाद भारत में संविधान बनाया गया, जिसके अंतर्गत संसद की व्यवस्था कायम की गई और देश संसदीय लोकतंत्र की राह पर बढ़ा। संसद के 60 वर्ष पूरे होने पर आकलन करें, तो क्या उस राह को चुनना अच्छा रहा है?

26 जनवरी, 1950 को संविधान बना और उसी दिन तकनीकी रूप से संसद शुरू हुई, लेकिन सदनों की पहली बैठक 13 मई, 1952 को हुई, तो संसद की पहली बैठक को आज 60 साल पूरे हुए हैं। हमने कहने को तो संसदीय लोकतंत्र की राह अपनाई, पर असल में हमने उस औपनिवेशिक व्यवस्था को अपना लिया जो अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने के लिए, भारतीयों को अनेक प्रकार से विभाजित-विखंडित रखने के लिए भारत में ही बनाई थी। 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा के द्वारा जो संविधान बनकर तैयार हुआ उसका 75-80 प्रतिशत भाग तो भारत शासन अधिनियम 1935, ब्रिटिश कैबिनेट मिशन प्लान 1946 और इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 पर आधारित था। यानी 26 जनवरी 1950 को लागू हुए इस संविधान का 75-80 प्रतिशत हिस्सा अंग्रेजों का ही बनाया हुआ है, हम भारतीयों का नहीं।

संविधान सभा में डा.अम्बेडकर के अलावा और कितने ही विद्वतजन थे। क्या यह कहें कि उन्होंने उस औपनिवेशिक व्यवस्था को ही भारत के लिए बेहतर माना?

दुर्भाग्य से उसी व्यवस्था को स्वीकारा। बेहतर मानने के लिए तो उन्होंने संसदीय व्यवस्था का नाम दिया, पर स्वीकारी गई व्यवस्था पूरी तरह से ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था नहीं थी। शायद संविधान सभा को यही व्यवस्था सही लगी कि जो चल रहा है उसी को चलने दें।

इसके पीछे क्या वजह रही हो सकती है?

संविधान सभा का उस समय का नेतृत्व पाश्चात्य संस्कृति में पला-बढ़ा था, ब्रिटिश संस्थाओं और अंग्रेजों से प्रभावित था। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से गुलाम की मानसिकता मालिक जैसा ही बनने की होती है।

क्या इसके मायने हैं कि ऐसे नेतृत्व ने गणतंत्र की जो शुरुआत की, वह गलत थी? संविधान की क्या उपलब्धि रही?

ऐसा कह सकते हैं, पर उस व्यवस्था का अब कोई ज्यादा लाभ नहीं है। जो भी संविधान बना, उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि कह सकते हैं कि एक तो उसे सारे देश ने स्वीकार कर लिया। भाषा, जाति, मत-पंथ आदि पर बंटे हुए हमारे देश ने सब भूलकर संविधान को स्वीकारा। दूसरे, संविधान जैसा भी बना, वह बराबर चल रहा है। दूसरे पड़ोसी देशों में संविधान बने और खत्म हो गए। इस उपमहाद्वीप में हमारा एकमात्र देश है जो 62 साल से बढ़ रहा है, अक्षुण्ण है।

उस संविधान के तहत बनी दो सदनों वाली संसद के तब के और अब के स्वरूप में क्या अंतर पाते हैं?

संसद के चरित्र, चेहरे और चलन में बहुत बड़ा अंतर आया है। शुरुआती बात करें, पहली और दूसरी लोकसभा को देखें तो उसमें ऐसे सदस्य थे जिन्होंने स्वाधीनता संघर्ष में भाग लिया था। ऐसे लोगों का बहुत बड़ा समूह था जो त्याग और सेवा की भावना से राजनीति में आए थे, इसे व्यवसाय समझकर नहीं आए थे। तब सदन में बड़ी संख्या में वकील, एडवोकेट, बैरिस्टर थे। इसके कारण वाद-विवाद का स्तर ऊंचा होता था, क्योंकि पहली, दूसरी लोकसभा में शहरी, अधिकारी और अभिजात्य वर्ग के लोग थे। आगे चलकर उन बैरिस्टर, एडवोकेट की जगह किसानों और ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोगों ने ले ली। हमारे विधानमंडल, यानी लोकसभा और विधान सभाएं जनता की अधिक प्रतिनिधिक हो गईं। क्योंकि आमजन, किसान और गांव के लोगों का प्रतिनिधित्व अधिक हो गया, अभिजात्य वर्ग का कम हो गया।

आज संसद में राष्ट्रीय महत्व व आम आदमी के मुद्दों पर बहस की बजाय छींटाकशी होती है और क्षेत्रीय स्तर के मुद्दे उछाले जाते हैं। शुरुआती दौर में गंभीर विषयों पर चर्चाएं की जाती थीं, जिसमें सबका सक्रिय सहभाग रहता था। आज स्थिति उलट क्यों है?

शुरुआती दौर की संसद में, जैसा मैंने पहले बताया, स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लेने वाले, वकील, बैरिस्टर और अभिजात्य वर्ग के लोग थे। 1964 तक, जब तक नेहरू प्रधानमंत्री रहे, संसद में प्रमुख रूप से कुछ अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मुद्दे बहस में आते थे। नेहरू जी, प्रधानमंत्री के नाते, हर सत्र में एक न एक प्रस्ताव लाते थे जिस पर लंबी बहस होती थी, अच्छे स्तर की बहस होती थी। अंतरराष्ट्रीय विषयों पर ज्यादातर नेहरू जी की पहल पर चर्चाएं होती थीं। उसके बाद श्री लाल बहादुर शास्त्री और श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में राष्ट्रीय मुद्दों पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा। आज स्थिति यह आ गई है कि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मुद्दे पीछे हो गए हैं। बहसें प्रादेशिक या स्थानीय मुद्दों पर होने लगी हैं। हालत यह है कि जो मुद्दे राज्य विधानसभाओं में, यहां तक कि पंचायतों में उठने चाहिए, वे लोकसभा में उठाए जाने लगे हैं।

आज संसद में बाहुबलियों, धनपतियों, दागियों का बोलबाला दिखता है। संसद का यह चेहरा कैसे बन गया?

वर्तमान में संसद में करीब 300 सांसद करोड़पति हैं। डेढ़ सौ से ज्यादा पर आपराधिक मामले लंबित हैं। इसके पीछे, मेरे विचार से, कई कारण हैं। पहला, समाज में मूल्यों, मान्यताओं, आदर्शों का अवमूल्यन हुआ है। आज सबसे बड़ा "मूल्य' है कि जिस क्षेत्र में आप हैं, उसमें किसी भी कीमत पर सफलता। उसके लिए जितना चाहे नीचे गिरना पड़े। क्योंकि आज समाज में सफल की ही पूजा होती है। दूसरा, किसी रास्ते से हो, अधिक से अधिक पैसा कमाओ। इससे समाज में मान बढ़ता है। तीसरा है सत्ता सुख, जो हर व्यक्ति भोगना चाहता है। तो सत्ता, सफलता और संपदा ही आज तीन सबसे बड़े मूल्य हो गए हैं। समाज में जब ये मूल्य बन गए तो इसी समाज के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के जरिए ये मूल्य संसद में भी प्रतिबिम्बित होते हैं। इसलिए आज राजनीति कम से कम समय में अधिक से अधिक पैसा बटोरने का व्यवसाय बन गई है। इसलिए ऐसे लोग चुनकर आने लगे हैं जिनका मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं रहा।

.....और इसी वजह से वाद-विवाद का स्तर गिरा?

स्वतंत्रता सेनानियों, वकीलों, बैरिस्टरों, अभिजात्यों की जगह जब धनपति और बाहुबलि चुनकर आएंगे तो वाद-विवाद का स्तर गिरना स्वाभाविक है।

चुनावों में जिस तरह पैसा झोंका जा रहा है, उस पर क्या कहेंगे?

राजनीति बहुत महंगी हो गई है। राजनीतिक दल चलाने, चुनाव लड़ने के लिए भारी मात्रा में पैसे की जरूरत पड़ती है। सवाल है, वह कहां से आए? शुरुआती दौर में उद्योगपति या व्यापारी लगभग सभी दलों को पैसा देते थे ताकि जरूरत के वक्त वे दल उनके काम आएं। आज स्थिति यह आ गई है कि उद्योगपति, व्यापारी तात्कालिक काम के हिसाब से पैसा दे देते हैं। लाइसेंस लेना हो, ठेका लेना हो तो मंत्री जी के पास जाकर काम विशेष के लिए सौदा किया जाता है। यानी "जॉब' के आधार पर लिया-दिया जाने लगा है। धीरे-धीरे अब तो लगभग सभी दलों में आपराधिक क्षेत्र से पैसा आने लगा है। चुनाव की बदलती शक्ल में बाहुबल की जरूरत पड़ने लगी। बाहुबली दलों को पैसा देने लगे ताकि जरूरत पड़ने पर नेताजी उनकी रक्षा करें यानी "प्रोटेक्शन मनी'। बाद में उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक दल में हमारा ही धनबल है, हमारा ही बाहुबल है तो हम ही क्या बुरे हैं, संसद में विधानमंडलों में जाने के लिए? वे खुद चुनाव में उतरने लगे। राजनीतिक दल भी जिताऊ उम्मीदवार को टिकट देने लगे, टिकट खरीदने की कुव्वत वालों को टिकट बेचे जाने लगे। एक सदस्य ने तो बताया कि उसे टिकट खरीदने के 5 करोड़ रु. देने पड़े थे। उस पर और 15 करोड़ खर्च करके वह सदस्य बना। अब वह अपने 20 करोड़ तो निकालेगा ही, अगले चुनाव के लिए भी दुगुने बनाएगा।

क्या इसी में से "सवाल के बदले नोट' या "वोट के बदले नोट' का चलन शुरू हुआ?

राजनीति महंगी होने, सांसदों- विधायकों के बिकने के पीछे मूल्यों का अवमूल्यन ही है। ईमानदारों के नहीं, पर बेईमान से बेईमान नेता के पैर छूने वाले बहुत मिलते हैं। फिर "सवाल पूछने के लिए नोट' देने का दृश्य होना स्वाभाविक था।

संसद के स्वरूप में जो सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष में सद्भावपूर्ण गरिमामय व्यवहार रहता था, आज वैसा क्यों नहीं दिखता?

संसद में प्रतिपक्ष तब संख्या की दृष्टि से बहुत कमजोर था, कांग्रेस का वर्चस्व था। देश की राजनीति और संसद, दोनों पर कांग्रेस हावी थी। ऐसे में जो सत्ता में थे, वे प्रतिपक्ष की बात कई बार मान लिया करते थे। तो सरकारी निर्णयों में प्रतिपक्ष की भी भागीदारी रहती थी। लेकिन आज अगर सत्तापक्ष प्रतिपक्ष का कोई संशोधन स्वीकार कर ले तो उसे वह अपनी कमजोरी मानने लगता है। आज सरकार अपनी शक्ति और सामर्थ्य के बारे में आश्वस्त नहीं है। ऐसा कह सकते हैं कि आज की सरकार अब तक की सबसे कमजोर सरकार है। उसे सौदेबाजों के समूह पर निर्भर रहना पड़ता है। सत्ता में बने रहने के लिए वह कैबिनेट के ऊपर एक "सुपर कैबिनेट' के सामने नतमस्तक रहती है। इसलिए इसके मंत्री एक-दूसरे के खिलाफ बोलते हैं, तो उसे भी स्वीकार कर लिया जाता है।


लोकसभा के पूर्व महासचिव डा. सुभाष कश्यप कहते हैं-

आज राजनीति कम से कम समय में अधिक से अधिक पैसा बटोरने का व्यवसाय बन गई है जनता और संसद के बीच आज गहरी खाई पैदा हो गई है। अपने ही चुने जन-प्रतिनिधियों के प्रति जनता की आस्था कम हो गई है। संसद के चरित्र, चेहरे और चलन में बहुत बड़ा अंतर आया है। हालत यह है कि जो मुद्दे राज्य विधानसभाओं में, यहां तक कि पंचायतों में उठने चाहिए, वे लोकसभा में उठाए जाने लगे हैं। सत्ता, सफलता और संपदा ही आज तीन सबसे बड़े मूल्य हो गए हैं। समाज में जब ये मूल्य बन गए तो इसी समाज के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के जरिए ये मूल्य संसद में भी प्रतिबिम्बित होते हैं। आज निर्वाचन व्यवस्था में सुधार चाहिए, क्योंकि भ्रष्टाचार और अपराधीकरण सहित तमाम बुराइयों की जननी आज की निर्वाचन व्यवस्था है। सही लोग चुनकर संसद में जाएंगे, तो सही कानून बनाएंगे। इससे संसद का चरित्र, चेहरा, चलन बदलेगा।


आज बैठकों के दौरान सदन खाली पड़े रहते हैं, सांसद आते ही नहीं, क्यों?

जनता और संसद के बीच आज गहरी खाई पैदा हो गई है। अपने ही चुने जन-प्रतिनिधियों के प्रति जनता की आस्था कम हो गई है।

...तो किन बिन्दुओं पर कौन से सुधारों की जरूरत है?

कई मोर्चों पर सुधार करने होंगे। प्रशासनिक, संसद, न्यायिक, शैक्षणिक स्तर पर सुधार चाहिए। सिपाही और बाबू के व्यवहार में अंतर होना चहिए। हम आज भी प्रजा बने हुए हैं, नागरिक नहीं बने हैं। सबसे बढ़कर, आज निर्वाचन व्यवस्था में सुधार चाहिए, क्योंकि

भ्रष्टाचार और अपराधीकरण सहित तमाम बुराइयों की जननी आज की निर्वाचन व्यवस्था है। सही लोग चुनकर संसद में जाएंगे, तो सही कानून बनाएंगे। इससे संसद का चरित्र, चेहरा, चलन बदलेगा। आज की निर्वाचन व्यवस्था समाज को बांटने वाली है। नेता समाज

को अलग अलग पहचानों में बांटकर अपने वोट बैंक बनाते हैं। इसके चलते महज 15 प्रतिशत वोट लेकर भी उम्मीदवार 90 प्रतिशत जीतने की गारंटी पा सकता है। इससे 7-12-15-18-20 प्रतिशत तक वोट पाने वाले जीतकर संसद में पहुंच जाते हैं। आज लोकसभा के कुल सांसदों में 78 प्रतिशत ऐसे हैं जिनके विरोध में अधिक वोट पड़े थे। वे जनप्रतिनिधि कैसे कहे जा सकते हैं?

जनता के सेवक यानी सांसद, संसद में पहुंचकर मालिक की सी ठसक क्यों दिखाने लगते हैं?

क्योंकि हम अभी तक प्रजा बने हुए हैं, नागरिक नहीं बने हैं। लोकतंत्र में आम आदमी मालिक होता है और राष्ट्रपति से लेकर सिपाही और सरकारी चपरासी तक जनता के सेवक होते हैं। भारत की जनता को यह समझना चाहिए कि वह मालिक है, जनप्रतिनिधि उसके सेवक हैं।

 

 



विकसित देशों की आर्थिक शक्ति को चुनौती

डा. अश्विनी महाजन

यह सही है कि अभी भी अमरीका, यूरोप के देश और जापान दुनिया के मानचित्र पर विकसित देश माने जाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन देशों की प्रति व्यक्ति आय बहुत ज्यादा है। प्रति व्यक्ति ऊंची आय के चलते वहां के लोगों का जीवन स्तर भी काफी अच्छा है, लेकिन अब दुनिया का आर्थिक संतुलन बदल रहा है। कोई जमाना था जब अमरीका आर्थिक ताकत की दृष्टि से दुनिया का नंबर एक देश तो था ही, यूरोप के विभिन्न देश और जापान की आर्थिक शक्ति की तुलना में भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका बहुत पीछे थे। पर दुनिया में सबसे तेजी से उभर रही विकासशील अर्थ व्यवस्थाओं के कारण ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के समूह को आज "ब्रिक्स' का नाम दिया गया है। "ब्रिक्स' अर्थात इन पांच देशों के नामों के पहले शब्द से बना एक नाम। ये पांचों देश अत्यंत तेजी से विकास ही नहीं कर रहे हैं बल्कि दुनिया के विकसित देशों की आर्थिक शक्ति को चुनौती भी दे रहे हैं। दुनिया का आर्थिक संतुलन बदल रहा है। आज से दस वर्ष पहले जिन देशों का वर्चस्व दुनिया में था, उनका प्रभाव कम हुआ है और तेजी से विकास कर रही इन पांच अर्थ व्यवस्थाओं ने अपना वर्चस्व आर्थिक शक्ति के नाते स्थापित भी किया है।

तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था


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गत मार्च में दिल्ली में सम्पन्न ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में (बाएं से दाएं) ब्राजील की राष्ट्रपति दिलमा राउसैफ, रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव, भारत के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, चीन के राष्ट्रपति हू जिन्ताओ और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जूमा

ब्रिक्स देशों का चौथा सम्मेलन हाल ही में दिल्ली में सम्पन्न हुआ। उल्लेखनीय है कि दक्षिण अफ्रीका इस समूह में पिछले वर्ष के सम्मेलन में ही शामिल हुआ था। उससे पूर्व इसमें केवल चीन, भारत, ब्राजील और रूस ही शामिल थे और इसे "ब्रिाक' के नाम से जाना जाता था।

क्रय शक्ति क्षमता के आधार पर अब चीन दुनिया की दूसरी और भारत तीसरी आर्थिक शक्ति बन चुका है। हम कह सकते हैं कि अब रूस, चीन और भारत ही नहीं, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका भी आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहे हैं। वै·िाक मंदी के दौर में यह प्रक्रिया और तेज हुई है और ये देश विकसित देशों से ज्यादा तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि विकसित देशों की आमदनी में एक ठहराव आ गया है, जबकि ब्रिक्स देशों की राष्ट्रीय आय 8 से 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। इसका मतलब यह नहीं है कि इन विकासशील देशों के लोगों का जीवन स्तर भी विकसित देशों सरीखा हो गया है। वास्तव में यह आर्थिक संवृद्धि केवल सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) के स्तर पर है। लेकिन जब हम प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो पाते हैं कि इस दृष्टि से अभी विकसित और विकासशील देशों के लोगों के बीच एक बड़ी खाई है। क्रय शक्ति क्षमता के आधार पर भी वर्ष 2009 में भारत की प्रति व्यक्ति आय मात्र 3260 डॉलर प्रतिवर्ष और चीन की प्रति व्यक्ति आय 6770 डॉलर प्रतिवर्ष थी। इसी वर्ष विकसित देशों में औसत प्रति व्यक्ति आय 36,473 डॉलर प्रतिवर्ष थी। इसलिए स्वभाविक ही है कि मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से दुनिया में भारत का स्थान वर्ष 2011 में 134वां और चीन का 101वां रहा। ऐसे में तेजी से विकास के बावजूद ब्रिक्स देशों में आम जन के जीवन स्तर में सुधार के लिए अभी बहुत लम्बा सफर तय करना बाकी है। इसलिए इनके और तेजी से विकास और आम जन के जीवन स्तर में सुधार हेतु सहयोगी भूमिका निभा सकते हैं। ब्रिक्स के पांच देशों की जनसंख्या दुनिया की कुल जनसंख्या का लगभग 40 प्रतिशत है। लेकिन वर्ष 2011 तक इन देशों की जी.डी.पी. 21 खरब डालर तक ही पहुंच पाई है। पर यह बात सही है कि पिछले दशक के प्रारंभ में चीन, भारत, ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका की अर्थ व्यवस्थाओं का कुल आकार वैश्विक अर्थ व्यवस्था के कुल आकार का मात्र छठा हिस्सा ही था, जो वर्ष 2011 तक बढ़कर वैश्विक अर्थ व्यवस्था का 29.5 प्रतिशत हो चुका है।


दुनिया में सबसे तेजी से उभर रही विकासशील अर्थ व्यवस्थाओं

के कारण ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के

समूह को आज "ब्रिक्स' का नाम दिया गया है। ये पांचों देश

अत्यंत तेजी से विकास ही नहीं कर रहे हैं बल्कि दुनिया के

विकसित देशों की आर्थिक शक्ति को चुनौती भी दे रहे हैं। दुनिया

का आर्थिक संतुलन बदल रहा है। आज से दस वर्ष पहले जिन

देशों का वर्चस्व दुनिया में था, उनका प्रभाव कम हुआ है और

तेजी से विकास कर रही इन पांच अर्थ व्यवस्थाओं ने अपना

वर्चस्व आर्थिक शक्ति के नाते स्थापित भी किया है।




स्थानीय मुद्रा के लाभ

ब्रिक्स देशों ने विकास की अपनी अपेक्षाओं को कार्यरूप देने और दुनिया के अमीर देशों के वर्चस्व को कम करने की अपनी कोशिशों के अंतर्गत दिल्ली में संपन्न सम्मेलन में अन्य बातों के अतिरिक्त अपने बीच व्यापार में उधार को स्थानीय मुद्रा आधारित करने का निर्णय लिया है। इसका अर्थ यह है कि भारत-ब्राजील या ब्राजील- रूस इत्यादि के बीच व्यापार का भुगतान अब डॉलर अथवा यूरो में नहीं बल्कि अपनी ही मुद्रा

में होना संभव हो जायेगा। दुनिया के विभिन्न देशों के बीच व्यापार का भुगतान डॉलर, पाऊंड या यूरो जैसी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा में होना अनिवार्य तो नहीं है, लेकिन फिर भी परम्परा यही है कि व्यापार में असंतुलन होने की स्थिति में उधार की सुविधा डॉलर में ही होती है। इस कारण से भारत सरीखे देशों को पर्याप्त मात्रा में डॉलर तथा अन्य विकसित देशों की मुद्रा का भारी भंडार (रिजर्व) रखना पड़ता है, ताकि अंतरराष्ट्रीय

भुगतानों में कोताही न हो। लेकिन यदि भुगतान अपनी ही मुद्रा में होता है तो विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में रखने की अनिवार्यता कम हो जाती है।

उल्लेखनीय है कि भारत का चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका से आयात अभी

तक 53 अरब डॉलर वार्षिक तक पहुंच चुका है। भारत द्वारा इन देशों को निर्यात 27.3 अरब डॉलर के लगभग है। ब्रिक्स देशों के बीच कुल व्यापार अब 230 अरब डॉलर का हो चुका है, जिसके वर्ष 2015 तक 500 अरब डॉलर तक पहुंचने की आशा है। स्थानीय मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा देने से न केवल ब्रिक्स देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय व्यापार बढ़ेगा, बल्कि डॉलर की अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में मान्यता भी कम होगी। इससे भुगतान शेष में घाटे के कारण डॉलर की कमी के चलते रुपये के अवमूल्यन की समस्या के भी समाधान की आशा है।

ब्रिक्स विकास बैंक की अवधारणा

अन्तरराष्ट्रीय शक्ति के रूप में उभरते ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार और निवेश में बढ़ोतरी से इन देशों में विकास को बल मिलेगा। ब्रिक्स देशों द्वारा न केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार को स्थानीय मुद्रा में चलाने का निर्णय लिया गया है, बल्कि इन देशों में निवेश को बढ़ावा देने हेतु विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक के मॉडल पर "ब्रिक्स विकास बैंक' की स्थापना के उद्देश्य से आगे बढ़ने का निर्णय भी लिया है। इस दृष्टि से इन देशों के वित्त मंत्री "ब्रिक्स विकास बैंक' के प्रस्ताव पर विचार करेंगे और आगामी ब्रिक्स की बैठक में रपट प्रस्तुत करेंगे। माना जा रहा है कि "ब्रिक्स विकास बैंक' ढांचागत विकास हेतु

सदस्य देशों के बीच संसाधनों को एकत्र करने का काम तो करेगा ही, वै·िाक संकट के समय उधार देने का काम भी कर सकेगा।

ब्रिक्स देशों की एकता से बहुत संभावनाएं जन्म ले रही हैं, लेकिन जरूरत इस बात की है कि ब्रिक्स देशों में सबसे ताकतवर देश चीन अपने रुख में बदलाब लाए। चीन द्वारा भारत की सीमाओं पर की जा रही छेड़खानी से ब्रिक्स देशों की एकता में दरार पड़ सकती है। ऐसे में अमरीका और अन्य विकसित देशों की दादागिरी से टक्कर लेना कठिन हो सकता है।

(लेखक पीजीडीएवी कालेज, दिल्ली विश्वय के एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

 गत मार्च में दिल्ली में सम्पन्न ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में (बाएं से दाएं) ब्राजील की राष्ट्रपति दिलमा राउसैफ, रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव, भारत के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, चीन के राष्ट्रपति हू जिन्ताओ और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जूमा



औरंगाबाद का डा. हेडगेवार रुग्णालय : मानवता का स्पर्श

औरंगाबाद का डा. हेडगेवार रुग्णालय मानवता का स्पर्श

कोई एक व्यक्ति चिकित्सा जैसा भरपूर लाभ कमाने वाला व्यवसाय सेवा भाव से आरम्भ करे और बीस वर्ष तक करता रहे तो भी यह एक उल्लेखनीय घटना ही कही जानी चाहिए। लेकिन जब सात चिकित्सक साथ मिलकर एक अत्याधुनिक चिकित्सालय बीस वर्ष तक सेवाभाव से चलाएं तो इसे सेवाभाव का अनुपम आदर्श ही कहना होगा। महाराष्ट्र के औरंगाबाद के सात चिकित्सकों ने डा. बाबासाहब आंबेडकर वैद्यकीय प्रतिष्ठान के माध्यम से यह कर दिखाया है।


$img_titleडा. बाबासाहब आंबेडकर वैद्यकीय प्रतिष्ठान औरंगाबाद में सामाजिक काम करने वाली एक संस्था है। इस संस्था से संबंधित 6-7 चिकित्सकों ने 1988- 89 में सात लाख रुपए कर्ज लेकर डा. हेडगेवार रुग्णालय शुरू किया। प्रारंभ में इस रुग्णालय के बारे में समाज के मन में कौतुहल, संदेह, भय और अवहेलना के भाव थे। लेकिन सब चिकित्सक उत्साह में थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारों में पले होने के कारण दृढ़ थे। आगे चलकर इसी समाज ने रुग्णालय का दृढ़ता से साथ दिया तथा सराहा भी। चिकित्सकों की भी हिम्मत बढ़ी। समाज के लिए जीवनभर काम करना, यह भाव मन में रखकर वे आज भी रुग्णालय चला रहे हैं। केवल 10 रोगियों की व्यवस्था से आरंभ किए गए इस रुग्णालय का विस्तार होकर, अब यह 150 रोगियों की व्यवस्था का रुग्णालय बन गया है। सफेद रंग की भव्य इमारत के इस रुग्णालय में अच्छे बड़े साफ बरामदे, भरपूर सूर्य-प्रकाश, खुली हवा की व्यवस्था है। रुग्णालय के सामने एक सुन्दर बगीचा भी है। विविध विषयों के 35 अनुभवी चिकित्सक यहां सेवा देते हैं। वे रोज करीब दस घंटे काम करते हैं। वेतन में मध्यमवर्गीय जीवन जीने के लिए आवश्यक राशि ही लेते हैं। किसी का भी निजी व्यवसाय या आय का अन्य कोई स्त्रोत नहीं है।

 आज व्यावसायिक क्षेत्र में चिकित्सकीय व्यवसाय को प्राप्त हुए स्वरूप को देखकर यह आश्चर्य लगता है कि गत करीब बीस वर्षों में यहां के किसी भी चिकित्सक को उसके काम के वेतन का हिसाब लगाते नहीं देखा गया।

डा. सतीश कुलकर्णी यहां के सबसे वरिष्ठ चिकित्सक हैं। उन्हें सब सम्मान देते हैं, सबके मन में उनके प्रति आदर का भाव है, लेकिन सब उन्हें अपना मित्र मानते हैं। सब से भरपूर प्रेम करना, सबको संभालना यही उनकी वृत्ति बन गई है। एक अन्य चिकित्सक डा. नरेन्द्र कुलकर्णी दिन-रात काम करते हैं। भावना प्रधान लेकिन कर्तव्य कठोर व्यक्तित्व। मराठवाड़ा क्षेत्र के सर्वोत्कृष्ट न्यूरोसर्जन हैं। यहां रुग्णालय का शुल्क भी एक विशेषता है। सामान्य कक्ष (जनरल वार्ड) के रोगियों से कोई शुल्क नहीं लिया  जाता। अब तक लाखों रोगियों ने इस रुग्णालय का लाभ उठाया है।

उत्तम और परिणामकारक सामाजिक सेवा देने वाली संस्था निर्माण करने के लिए जिन बातों का ध्यान रखना और प्रयास
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रुग्णालय द्वारा संचालित मोबाइल वैन



आवश्यक होते हैं, वह सब यहां सब ने मिलकर किए। इस कारण रुग्णालय को यह सफलता मिली है। डा. बाबा साहेब आंबेडकर चिकित्सकीय प्रतिष्ठान का उद्देश्य समाज को उत्तम चिकित्सकीय सेवा देने के साथ-साथ समाज के पिछड़े वर्गों को सक्षम बनाना भी है। इस उपक्रम के अंतर्गत सेवा बस्ती में रहने वाली जो लड़कियां स्कूल नहीं जातीं उनके लिए कढ़ाई, सिलाई, जूट का सामान बनाने तथा फैशन डिजायनिंग का प्रकल्प शुरू किया गया है। इसके अलावा और भी अनेक प्रकल्प प्रतिष्ठान द्वारा चलाए जा रहे हैं। डा. बाबासाहब आंबेडकर वैद्यकीय प्रतिष्ठान के सब प्रकल्पों को समाज की ओर से बहुत अच्छा सहयोग मिल रहा है। रक्तपेटी के रक्तदान शिविरों का आयोजन सेवाभावी संस्थाएं करती हैं। डा. हेडगेवार रुग्णालय में रोज 50 वरिष्ठ नागरिक सेवाव्रती के रूप में स्वागत कक्ष, जानकारी कक्ष, पंजीयन, पूछताछ कक्ष, सलाह कक्ष का काम देखते हैं। इतना ही नहीं, वे रोगी के रिश्तेदारों के छोटे-मोटे काम भी करते है। ■ न्यूजभारतीडॉटकॉम




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