१५ जुलाई २०१२
           
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केरल : हिंसक और बर्बर कम्युनिस्टों ने की पूर्व कामरेड चन्द्रशेखरन की हत्या

केरल /प्रदीप कृष्णन


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हिंसक और बर्बर कम्युनिस्टों ने की पूर्व कामरेड चन्द्रशेखरन की हत्या

माकपाई कितने हिंसक और अमानवीय होते हैं इसका एक और उदाहरण गत 4 मई को केरल में देखने को मिला जब उसके गुंडों ने अपने ही एक पूर्व सहयोगी की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी। केरल में वैसे तो रा.स्व.संघ और उसके समविचारी संगठनों के कार्यकर्ता ही माकपाई हिंसा का शिकार होते रहते हैं। पर पूर्व में भी कई बार ऐसा हुआ है कि माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पाटीं (माकपा) में वर्षों तक साथ रहने के बाद किसी मतभेद के कारण पार्टी छोड़ देने वाले को भी ये लोग बर्दास्त नहीं करते और उसे रास्ते से हटा देते हैं। गत 4 मई की रात कोझीकोड जिले के ओंचियम् गांव में जिस प्रकार से टी.पी. चन्द्रशेखरन की हत्या की गई उससे यह एक बार और साफ हो गया कि कम्युनिस्टों का जनाधार घट रहा है और इस बौखलाहट में वे हिंसा पर उतारू होकर लोगों में भय पैदा करना चाहते हैं, ताकि लोग डर कर पार्टी में ही बने रहें। ओंचियम् के चर्चित व सर्वप्रिय नेता टी.पी.चन्द्रशेखरन को उस समय निशाना बनाया गया जब वे रात करीब 10 बजे मोटर साइकिल से अपने घर लौट रहे थे। पुलिस सूत्रों के अनुसार लगभग 7 लोगों के एक गुट ने पहले उन पर बम फेंका, उनके गिरने के बाद धारदार हथियारों से उन पर हमला बोल दिया। हमला इतना बर्बरतापूर्ण था कि चन्द्रशेखरन का चेहरा तक पहचानने लायक नहीं रहा। 51 वर्षीय इस कम्युनिस्ट नेता के चेहरे पर कम्युनिस्ट गुंडों ने 51 गहरे घाव कर दिए।

चन्द्रशेखरन का अपराध बस इतना था कि उन्होंने सन् 2008 में माकपा का साथ छोड़ दिया था और 2009 के पंचायत चुनावों में उन्होंने रिवोल्यूशनरी माÐक्सस्ट पार्टी (आर.एम.पी.) बनाकर न केवल अपनी ओंचियम् पंचायत में विजय हासिल की बल्कि आसपास के गांवों में भी उनकी पार्टी को समर्थन मिला। चन्द्रशेखरन् ने पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा बिना विचार विमर्श के इरामला पंचायत का प्रशासन जनता दल (सेकुलर) को सौंपने के विरोध में पार्टी छोड़ी थी। उनके पार्टी छोड़ने और नई पार्टी बनाने के बाद से इस क्षेत्र में हुए लगभग सभी छोटे-बड़े चुनावों में माकपा को हार का मुंह देखना पड़ा। लोकसभा चुनावों में भी पार्टी को अपने मजबूत गढ़ वाडाकारा संसदीय क्षेत्र में भी हार का स्वाद चखना पड़ा। इसके बाद माकपा न चन्द्रशेखन को वापस पार्टी में लाने के भी प्रयास किए लेकिन बात नहीं बनी। तब अनेक कम्युनिस्ट नेताओं ने चन्द्रशेखरन के कृत्य को "अपराध' बताना शुरू कर दिया था और "सजा' देने की बात कही थी। हालांकि अब माकपाई नेता घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं और चन्द्रशेखरन के मामले में मासूम और अनभिज्ञ दिखने का नाटक कर रहे हैं। पर चन्द्रशेखरन के भाई सेतु माधवन ने बताया कि हम सब हमेशा उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे, पर वे अपनी जान की परवाह न कर अपने कामरेड़ों की सुरक्षा की चिंता करते थे। इस सिलसिले में वे मुख्यमंत्री ओमेन चांडी से भी मिले थे।


कम्युनिस्टों का जनाधार घट रहा है और

इस बौखलाहट में वे हिंसा पर उतारू

होकर लोगों में भय पैदा करना चाहते हैं,

ताकि लोग डर कर पार्टी में ही बने रहें।


पुलिस ने इस मामले में तेजी से खोजबीन करते हुए यह साफ कर दिया है कि चन्द्रशेखरन की हत्या के तार माकपा से ही जुड़े हैं। 7 सदस्यीय एक गिरोह को इस काम के बदले 35 लाख रु. दिए गए। हत्यारों द्वारा प्रयुक्त मोबाइल फोन के रिकार्ड खंगालने के बाद पुलिस इस नतीजे पर पहुंची है कि हत्यारों ने पूरी योजना से और स्थानीय लोगों के सहयोग से इस काम को अंजाम दिया और फिर वे कर्नाटक के रास्ते मुम्बई भाग गए। सूत्रों के अनुसार उन 7 हत्यारों में से 2 का माकपाई हिंसा का इतिहास रहा है। इस मामले में प्रयुक्त इनोवा कार को बरामद कर लिया गया है और पूछताछ के लिए 5 लोगों को भी हिरासत में लिया गया है। पुलिस इस मामले में कन्नूर जेल में पहले से ही विभिन्न वारदातों के सिलसिले में बंद माकपाई गुंडों पर नजर रखे हुए है। संदेह है कि चन्द्रशेखरन की हत्या की साजिश कन्नूर जेल में बंद माकपाइयों के ही एक गुट ने रची है।

इस सारी सचाई को जानने के कारण ही चन्द्रशेखरन के परिजनों और आर.एम.पी.के कार्यकर्ताओं ने घड़ियाली आंसू बहा रहे माकपाइयों को संवेदना व्यक्त करने के लिए ओंचियम् न आने देने की घोषणा कर दी, सिवाय वरिष्ठ माकपाई वी.एस. अच्युतानंदन के। और अच्युतानंदन "माकपा के घोषित शत्रु' की मौत पर संवेदना जताने गए भी और चन्द्रशेखरन को एक "बहादुर कामरेड' बताया। अच्युतानंदन की इस संवेदना को भी माकपाई "पार्टी विरोधी कृत्य' ठहरा सकते हैं, क्योंकि पार्टी सचिव पिनरई विजयन के चलते पार्टी के पोलित ब्यूरो से चलता कर दिए गए पुर्व मुख्यमंत्री व वयोवृद्ध माकपाई नेता वी.एस. अच्युतानंदन भी कुछ माकपाइयों की आंखों की किरकिरी बने हुए हैं। उधर चन्द्रशेखरन की हत्या के बाद ओंचियम् में जगह-जगह पर हिंसक प्रदर्शन हुए और मोझीपरा, कुन्नमकरा, ओरकाटेरी तथा अन्य स्थानों पर कुछ वाहनों व लगभग 25 माकपाइयों के घरों पर लोगों ने धावा बोला। चन्द्रशेखरन की हत्या के बाद दु:ख से व्याकुल उनकी धर्मपत्नी रेमा ने कहा कि, "उन लोगों ने उन्हें मार दिया, पर कभी हरा नहीं पाए। उनके विचार मरेंगे भी नहीं। हमारा संघर्ष जारी रहेगा। ओंचियम् के लोग ही उनके संघर्ष को आगे तक ले जाएंगे।'

 

 

 



महाराष्ट्र : लोग पानी से बेहाल, नेता चलें राजनीति की चाल

महाराष्ट्र /द.बा. आंबुलकर

लोग पानी से बेहाल, नेता चलें राजनीति की चाल

महाराष्ट्र के वर्तमान हालात को सूखा, अकाल या पानी की कमी- किन शब्दों में रेखांकित करें, इसे लेकर बयानबाजी जारी है। राज्य के जल आपूर्ति मंत्री लक्ष्मण राव ढोबले के अनुसार महाराष्ट्र के सतारा, सांगली, सोलापुर, बीड़, उस्मानाबाद, लातूर, धुलिया, नगर तथा नसिक- इन 9 जिलों में पानी की भीषण कमी है। राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की मानें तो यह सूखे की स्थिति है। जबकि उप मुख्यमंत्री अजित पवार के अनुसार राज्य में अकाल की स्थिति है। संबद्ध विभाग के मंत्री, उप मुख्यमंत्री तथा मुख्यमंत्री द्वारा मौजूदा हालात पर दिये जा रहे बयानों को सोनिया कांग्रेस- पवार कांग्रेस के बीच की आपसी खींचतान तथा राजनीतिक तौर पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जबकि राज्य के एक तिहाई क्षेत्र का हाल बढ़ती गर्मी के साथ बद से बदतर होता जा रहा है।

इसकी शुरुआत मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने अपने प्रभाव क्षेत्र सतारा से की। जिले के कुछ गावों में जाकर मुख्यमंत्री ने स्थिति का जायजा लिया, सूखे पड़े तालाब तथा खेत-बागान देखे, गांवों के लोगों का हाल जाना और ग्रामीणों- मजदूरों के साथ बैठकर भोजन भी किया। मुख्यमंत्री द्वारा सूखे का जायजा लेते समय ग्रामीणों-मजदूरों द्वारा लाया गया भोजन उन्हीं के साथ करने की शासन-प्रशासन स्तर पर काफी चर्चा हुई। पर इसका नतीजा यह हुआ कि मुख्यमंत्री चव्हाण जब सतारा जिले के ही आरपाड़ी क्षेत्र का जायजा लेने पहुंचे तो उनको दिखाने और सूखे की स्थिति को छिपाने के लिए स्थानीय प्रशासन ने फिल्मी स्टाइल में एक "सेट' जमा दिया। हुआ यूं कि मुख्यमंत्री की आरपाड़ी यात्रा के दौरान काम पर "ग्रामीण मजदूर' के तौर पर काम करते हुए दिखाने के लिए जिले में कार्यरत प्रशिक्षणार्थी पुलिसकर्मियों को लगाया गया। इन पुलिसकर्मियों को मुख्यमंत्री के दौरे के दो दिन पहले से ग्रामीणों के भेष में तैनात किया गया। यहां तक कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत वृक्षारोपण का दिखावा करने के लिए पेड़ों की बड़ी डालियां काटकर मुख्यमंत्री के दौरे की पूर्व संध्या पर सड़क के दोनों ओर लगवाइं गयीं। जब मुख्यमंत्री चव्हाण ने सूखा क्षेत्र की यात्रा कर वहां मजदूरी करने वाले युवाओं से चर्चा की तो उन "ग्रामीण युवा मजदूर' बने पुलिसवालों ने पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार अपने सारे संवाद बोल दिये। पर मुख्यमंत्री के साथ गये गृहमंत्री आर.आर. पाटिल तथा ग्रामीण विकास मंत्री जयंत पाटिल ने जब वहां मौजूद महिलाओं से चर्चा की तो उन्हें असलियत पता चली। मुख्यमंत्री द्वारा सूखाग्रस्त क्षेत्र की यात्रा के दौरान इस प्रकार की "प्रशासनिक नौटंकी' करने के लिए इन दोनों मंत्रियों ने स्थानीय प्रशासन के साथ-साथ कांग्रेसी नेताओं को भी आड़े हाथों लिया।



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सूखे की स्थिति को छिपाने के लिए प्रशासन ने पुलिसकर्मियों को नकली किसान बनाकर खेत में उतारा तो शरद पवार अपनी ही गठबंधन सरकार की निंदा में जुटे और राहुल गांधी भी सतारा जाकर भाषण दे आए, पानी नहीं!



 

 


मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण द्वारा सुखाग्रस्त क्षेत्र की इस प्रकार से यात्रा करने व सूखाग्रस्त लोगों से मिलने की इस पहल पर राष्ट्रवादी कांग्रेस के अध्यक्ष तथा केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने तीखा कटाक्ष किया। राज्य सरकार द्वारा राहत के लिए केन्द्र से विशेष अनुदान न मांगने के लिये भी शरद पवार ने राज्य के कांग्रेसी नेताओं को ही दोषी करार किया। अपने सहयोगी दल के अध्यक्ष शरद पवार की टिप्पणियों को नजरंदाज करते हुए मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने अपने राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी के साथ सतारा के सूखाग्रस्त क्षेत्र का दोबारा दौरा किया। इन कांग्रेसी नेताओं ने मात्र ढाई घंटे में

 

सूखा-पीड़ित ग्रामीणों की समस्याएं जानकर समाधान ढूंढने की राजनीतिक औपचारिकता पूरी कर दी। राहुल गांधी जब सतारा के सूखा पीड़ित ग्रामीणों को संबोधित कर रहे थे तो कुछ ग्रामीणों ने उनके खिलाफ नारेबाजी कर सूखे से तुरंत राहत देने की मांग की। कुछ प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने धरदबोचा बावजूद इसके कुछ ग्रामीण प्रदर्शनकारियों ने "इस क्षेत्र में सूखा हर साल पड़ता है और नेताओं की यात्राएं भी हर साल होने के बावजूद गर्मी के दिनों में हमें पीने का पानी तक नसीब नहीं होता। यह कुदरती तथा प्रशासनिक ज्यादती कब तक जारी रहेगी, हमें हमारी जिंदगी में पेयजल कब नसीब होगा?' इस प्रकार के बैनर लहराए। इससे हैरान-परेशान मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने चुप्पी साधना ही उचित समझा, जबकि राहुल गांधी ने केवल इतना कहते हुए अपना भाषण समाप्त कर दिया कि "राज्य में हमारी सरकार है तथा मुख्यमंत्री सूखे को समाप्त करने का प्रयास करेंगे।'



मायावती सरकार के घोटालों की खुल रही है परतें

उ.प्र./शशि सिंह

मायावती सरकार के घोटालों की खुल रही है परतें


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मायावती के शासन काल ४० हजार करोड रुपयों के घोटाले हुए। उन सबकी जांच कराई जाएगी और दोषियों को माफ नहीं किया जाएगा।' उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जब यह कहते हैं तो सहसा विश्वास ही नहीं होता है कि इतना बड़ा घोटाला हुआ होगा। यह सच भी है कि मायावती के राज में उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर जितनी आर्थिक अनियमितताएं हुई, आजादी के बाद किसी भी राज्य सरकार में नहीं हुई। पूरा का पूरा पांच साल "घोटालों का काल' कहा जा सकता है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाला, ईको पार्क घोटाला, नोएडा भूमि घोटाला, मायावती के आवास निर्माण में हुई अनियमितता, हाथी मूर्ति घोटाला-ये सब नए घोटाले हैं। मायावती के पहले के शासनकाल में हुए ताज कारिडोर घोटाले और आय से अधिक संपत्ति के मामले भी अभी तक लंबित

हैं। बहरहाल आजकल चर्चा हो रही है हाथी मूर्तियों तथा ईको पार्क में हुए घोटाले की। प्रदेश की राजधानी लखनऊ और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली से सटे नोएडा में बहुजन समाज के नेताओं के नाम पर बने पार्कों और स्मृति स्थलों पर लगी हाथी की मूर्तियों को

बनवाने और स्थापित करवाने में करोड़ों रुपये के घोटाले की बात सामने आ रही है। इस मामले में कई मुकदमे भी दर्ज किए जा चुके हैं। ताबड़तोड़ छापेमारी की जा रही है। घोटाले के तार पूरे प्रदेश से जुड़े हुए हैं। यह मामला तो दबा रह जाता, लेकिन लूट की बंदरबांट में बेईमानी के कारण यह मामला खुल गया। आगरा जिले के फतेहपुर सीकरी निवासी मदन लाल ने राजधानी के गोमती नगर थाने में शिकायत दर्ज कराई कि लखनऊ मार्बल्स की मालकिन विद्या अग्रवाल के पति आदित्य अग्रवाल ने उन्हें एक हाथी की मूर्ति बनाने के लिए 48 लाख रुपये देने को कहा था, लेकिन एक लाख अग्रिम, बाद में 6 लाख 56 हजार रु. यानी कुल 7 लाख 56 हजार रुपये ही दिए। इसी के बाद मामला तूल पकड़ने लगा। कहते हैं कि इतने बड़े पैमाने पर हुए घोटाले को शासन में उच्च स्तर पर संरक्षण मिला हुआ था। लूटे गए सरकारी धन की बंदरबांट ऊपर से नीचे तक हुई। बहरहाल जब आरोपी आदित्य के यहां छापा मारा गया तो अधिकारी दंग रह गए। तहखाने से ही उसका कार्यालय संचालित हो रहा था। वहां से पुलिस को एकमुश्त 64 लाख रुपये नकद मिले। कई ऐसे महत्वपूर्ण कागजात भी मिले जिनसे घोटाले में बड़े अधिकारियों की संतिप्तता साबित होती है। बताया जाता है कि लखनऊ मार्बल्स ने एक हाथी को तैयार कराने में 5 लाख 62 हजार रुपए खर्च किए। पर उसे नोएडा तक भिजवाने, उसके रंग-रोगन और रख-रखाव के लिए 47 रु. लाख वसूले। यानी एक हाथी की कीमत 5 लाख 62 हजार रु. और ढुलाई आदि पर 47 लाख रु. खर्च हुए। एक हाथी की कुल कीमत पड़ी 52 लाख 62 हजार रुपए। उस पर लगने वाला वैट (मूल्य संवर्धित कर) अलग से। हाथी की ऐसी 16 मूर्तियों को बनवाने और नोएडा के पार्क में लगाने का आदेश हुआ था। हाथी-मूर्ति में लूट के इस खेल में और भी बड़े घोटाले हुए हैं। राजधानी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आशुतोष पांडेय के अनुसार चुनार चेन सैंड स्टोन के एक हाथी की कीमत सवा चार लाख रुपए तय की गई थी, लेकिन उसकी फिनिशिंग, कटाई और ढुलाई में करीब 54 लाख रुपये का खर्च दिखाया गया है। यानी एक हाथी की कुल लागत पड़ी 58 लाख रुपये। उन्होंने बताया कि इसकी जांच-पड़ताल हो रही है कि इसमें कैसे और किन लोगों ने हिस्सेदारी की। बताते चलें कि आदित्य अग्रवाल इस बड़े खेल का बहुत छोटा-सा खिलाड़ी है। उसने अगर मदन लाल को 48 लाख रु. वादा कर केवल 7

लाख 56 हजार रु. दिए तो बाकी के रुपए अपने पास ही तो रख नहीं लिए होंगे। ऊपर से लेकर नीचे तक हिस्सा पहुंचाया होगा। तभी तो मामला दबा रहा और माया शासन जाने के बाद जिनके साथ नाइंसाफी हुई, वे बेईमानी का आरोप लगाते हुए सामने आ रहे हैं। राजस्थान के रूपेश बंसल ने भी हजरत गंज थाने में शिकायत दर्ज कराई है कि पत्थरों की आपूर्ति करने के बाद उसके भी लाखों रुपए हड़प लिये गए हैं।

हाथी घोटाले की तरह ही ईको पार्क के रख-रखाव में भी भारी लूट की बात सामने आयी है। ईको पार्क (बौद्ध विहार, शांति उपवन) राजधानी के वीआईपी रोड पर स्थित है। बताते हैं कि यहां तैनात लोक निर्माण विभाग के एक अवर अभियंता (जेई) ने मिस्त्री को ही ठेकेदार बनवाया, उसे बिना "वर्क आर्डर' के काम दिलाया और लाखों रु. खुद हड़प लिये। फतेहपुर सीकरी (आगरा) के निवासी अशोक कुमार ने पुलिस को बताया कि वह ईको पार्क में पहले एक ठेकेदार के साथ मिस्त्री का काम करता था। उसे लोक निर्माण विभाग के अभियंता अभिमन्यु ने ठेकेदार बनाने का लालच देकर अपनी फर्म का पंजीकरण कराने की सलाह दी। इस पर उसने आगरा से ही फर्म का पंजीकरण करवा लिया। अवर अभियंता ने उसे बिना "वर्क आर्डर' के ईको पार्क में दीवारों के पत्थर बदलने, कटिंग व मरम्मत का ठेका दे दिया। 200 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से उसे करीब साढ़े सात लाख रुपए के भुगतान की बात तय हुई थी, लेकिन बाद में उसे दो चेकों के माध्यम से केवल ढाई लाख रुपये दिए गए। शेष भुगतान के लिए उक्त अवर अभियंता के कई चक्कर लगाने पड़े, फिर भी उसका भुगतान नहीं मिला। उसने आरोप लगाया कि उक्त अवर अभियंता ने उसके सिर पर रिवाल्वर सटाकर मारने की धमकी भी दी और सादे "लेटर पैड' पर हस्ताक्षर करा लिया। बाद में पता चला कि अवर अभियंता ने उक्त "लेटर पैड' के जरिए शेष भुगतान हड़प लिया। अब उसे चुप रहने को कहा जा रहा है। उसने भी हजरत गंज थाने में मुकदमा दर्ज कराया है।



सहारनपुर : गोवंश रक्षकों को बताया गोवंश के लुटेरे

सहारनपुर

सपा सरकार के आते ही पुलिस ने दिखाई तेजी

गोवंश रक्षकों को बताया गोवंश के लुटेरे

वैसे तो उत्तर प्रदेश का सहारनपुर जिला काफी समय से गो तस्करों का का अड्डा बना  हुआ है। जिले में कई जगहों पर अवैध रूप से गोवंश की हत्या और गोमांस का अवैध व्यापार धड़ल्ले से चल रहा है। हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड की सीमा को जोड़ने वाला उ.प्र. का सहारनपुर जिला गो-तस्करों द्वारा राज्यों की सीमा पार कराने का एक प्रमुख केन्द्र है। समाजवादी पार्टी की सरकार आने को बाद से इस जिले के पशुतस्करों के हौसले बुलंद हैं और सपा सरकार भी उन्हीं की मदद कर रही है। यही वजह है कि इन दिनों पूरा सहारनपुर जिला उबल रहा है और जगह-जगह पर हिन्दू संगठनों के लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। इस आक्रोश के लिए जिम्मेदार है वह पुलिस-प्रशासन जिसने गोवंश रक्षकों पर ही गोवंश की लूट और डकैती का झूठा मकदमा दर्ज किया और गो-तस्करों को पशु व्यापारी बताकर उनका संरक्षण कर रही है।

घटनाक्रम के अनुसार गत 4 मई की सायंकाल मुस्लिमों के प्रमुख केन्द्र देवबंद थाना क्षेत्र के भायला गांव से होकर गोवंश तस्करों के 5 ट्रक जा रहे थे। इसकी जानकारी जब हिन्दू युवकों को लगी तो उन्होंने ट्रक रुकवा लिए। चारों तरफ से ग्रामीणों ने ट्रकों को घेरा तो 2 चालक ट्रक लेकर भागने में कमयाब हो गए और बाकी ट्रकों के ड्राइवर भाग गए। 3 ट्रकों में से लगभग 70 गाय और बछड़ों को ग्रामीणों ने मुक्त करा दिया। इसके बाद गंगोह निवासी इकबाल पुत्र अल्लाबंद ने क्षेत्र के सुपरिचित भाजपा नेता रामपाल सिंह पुण्डीर सहित अज्ञात लोगों के खिलाफ देवबंद थाने में हथियारों के बल पर पशु व नकदी लूटने का मुकदमा दर्ज करवा दिया। पुलिस ने भी बिना छानबीन किए लूट व डकैती की धाराओं (धारा 395, 397) में मामला दर्ज कर लिया। वस्तुस्थिति यह है कि उस दिन रामपाल सिंह पुण्डीर भायला गांव में थे ही नहीं। उधर भायला गांव जाकर पुलिस ने मुनादी पिटवा दी कि लूटी गई गाय थाने तक पहुंचा दें वरना सख्त कार्रवाई की जाएगी। फिर 7 मई की सायंकाल रामपाल सिंह पुण्डीर व गायों की तलाश में गांव में छापेमारी की गई। पुलिस का दावा है कि उसने 11 गाय और 6 बछड़े बरामद कर लिए हैं, जबकि ग्रामीणों का कहना है कि वे गाय व बछड़े उनके हैं, तस्करों से छुड़ाए गए नहीं।

इस बीच बिजनौर के अख्तराबाद निवासी खलील अहमद,इरफान, तस्लीम और महबूब भी देवबंद कोतवाली पहुंचे और पशु खरीद के कागजात दिखाकर कथित तौर पर लूटे गए गोवंश को वापस दिलाने की मांग की। पुलिस ने उनके खिलाफ पशु व गोवंश संरक्षण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेजने की वजाय वापस जाने दिया। नियमानुसार यदि व्यापार के लिए ट्रकों से पशुओं को लाया-ले जाया जा रहा है तो एक ट्रक में 5 से ज्यादा गाय या भैंस नहीं होनी चाहिए। पर 3 ट्रकों में 70 के लगभग गाय-बछड़ों को ठूंस-ठूंसकर भरने वाले ये कथित व्यापारी क्या पशु तस्कर नहीं थे? पुलिस प्रशासन की इसी दोगली और मुस्लिमपरस्त नीति के विरुद्ध हिन्दू संगठनों में जबरदस्त आक्रोश पैदा हो गया। सहारनपुर, देवबंद, रामपुर मनिहारन, गंगोह, तलहेड़ी बुजुर्ग, ननौता सहित जिले के सभी छोटे-बड़े कस्बों में प्रदर्शन, सांकेतिक चक्का जाम, पुतला दहन व सभाएं हुर्इं और भाजपा नेता रामपाल सिंह पुण्डीर व अन्य पर से लूट का झूठा मुकदमा वापस लेने व गो-तस्करों के विरुद्ध कार्रवाई करने की मांग की गई। भाजपा, विश्व हिन्दू परिषद्, हिन्दू जागरण मंच, युवा रामा दल आदि संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो विरोध प्रदर्शन और व्यापक होगा।


हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड की सीमा को जोड़ने वाला उ.प्र. का सहारनपुर जिला गो-तस्करों द्वारा राज्यों की सीमा पार कराने का एक प्रमुख केन्द्र है।


इस बीच 8 मई को सहारनपुर जिले के ही कमेला क्षेत्र में छापेमारी के दौरान भारी मात्रा में गोवंश की खालें, गोवंश के अवशेष, 12 जिंदा बैल और सांड़ मिले। गोमांस से भरी दो जीपें भी बरामद हुइ। पुलिस ने मौके पर से अजीम और नूर हसन को गिरफ्तार किया, बाकी साथी भागने में कामयाब रहे। साफ है कि सहारनपुर में गोवंश रक्षकों और गो-हत्यारों के बीच संघर्ष बढ़ सकता है। देखना है कि प्रशासन क्या भूमिका अपनाता है।

 

 


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