१५ जुलाई २०१२
           
पाञ्चजन्य   Like Minded

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मंथन

लोकतंत्र के अंगने में हत्यारे!

इसी 4 मई की रात में टी.पी.चन्द्रशेखरन, उत्तरी केरल के कोझीकोड जिले में ओनचियम गांव के अपने घर की ओर मोटर साइकिल पर अकेले जा रहे थे कि कार में सवार कुछ हत्यारों ने उन्हें घेर लिया और उन पर तेज धार वाले हथियारों से ताबड़तोड़ हमला बोल दिया। लहुलूहान चन्द्रशेखरन जमीन पर गिर गये। उनके चेहरे और सिर पर 51 घाव गिने गये। वे मृत घोषित कर दिये गये। चन्द्रशेखरन का अपराध क्या था और उनके हत्यारे कौन थे? चन्द्रशेखरन कभी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एक जांबाज कार्यकर्त्ता हुआ करते थे, किन्तु धीरे-धीरे पार्टी के अधिनायकवादी और हिंसक तौर-तरीकों से उनका मोहभंग हो गया और 2008 में माकपा छोड़कर उन्होंने रिवोल्यूशनरी मार्क्सिस्ट पार्टी का गठन किया। वे स्वयं को मार्क्सवादी ही कहते रहे। किन्तु केरल माकपा के राज्य सचिव पिनरई विजयन ने उन्हें 'कुलमकुटी' यानी 'विश्वासघाती' और 'पार्टी द्रोही' घोषित कर दिया। इसी अपराध की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। केरल में किसी 'पार्टी द्रोही' की हत्या का यह पहला मामला नहीं है। केरल माकपा का इतिहास ऐसी अनेकानेक हत्याओं से रक्तरंजित है।

विद्रोहियों की हत्या का इतिहास

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठन से आकर्षित होकर अनेक बागी माकपाईयों ने संघ के वैचारिक संगठनों में शरण ली, जिसके परिणामस्वरूप माकपा के लोगों द्वारा संघ कार्यकर्ताओं की हत्या और बागियों से प्रतिशोध का लम्बा इतिहास लिखा गया। अभी कुछ महीने पहले ही एक संघ कार्यकर्त्ता की हत्या के आरोप में कुछ माकपाई गुंडों को न्यायालय ने मृत्युदंड की सजा सुनायी। अब एक स्कूल शिक्षक व भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यकर्त्ता के.टी.जयकृष्णन को कक्षा के छोटे छोटे बच्चों के सामने माकपाई हत्यारों ने टुकड़े-टुकड़े कर डाला। तब माकपा की सरकार थी, इसलिए सही से जांच नहीं हो पाई, अब यह मामला दोबारा खुलने की बात हो रही है। एक मुस्लिम कार्यकर्त्ता माकपा छोड़कर नवगठित 'पापुलर फ्रंट आफ इंडिया' में चला गया। 22 अक्तूबर, 2006 को तलासेरी के पास उसकी हत्या कर दी गयी। तत्कालीन माकपाई सरकार ने उस हत्या की सीबीआई द्वारा जांच की मांग ठुकरा दी थी। अब कांग्रेस और मुस्लिम लीग की नई गठबंधन सरकार ने वह जांच खुलवा दी, जिसके फलस्वरूप पिछले सप्ताह ही दो जिला स्तर के माकपाई कार्यकर्त्ताओं को उस हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।

अपनी पार्टी के बागियों और विपक्षी दलों के कार्यकर्त्ताओं की हत्याएं क्या कुछ स्थानीय कार्यकर्त्ताओं की अपने मन से की गई प्रतिक्रियाएं हैं या यह कम्युनिस्ट पार्टी की अधिकृत नीति और उसकी विचारधारा का अभिन्न अंग हैं? इस रहस्य पर से पर्दा उठाया केरल माकपा की इडुक्की जिला समिति के 25 साल से सचिव चले आ रहे एम.एम. मणि ने। मणि पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हैं, प्रांतीय समिति के सदस्य हैं। केरल माकपा के राज्य सचिव पिनरई विजयन एवं पोलित ब्यूरो सदस्य कोदियारी बालाकृष्णन आदि ने उनके साथ काम किया है। एम.एम. मणि ने 26 मई को थोडुपुझा नामक स्थान पर एक जनसभा में गर्वोक्ति की कि माकपा के बागियों का वही हश्र होगा जो टी.पी. चन्द्रशेखरन का हुआ है। यह पार्टी की सुविचारित नीति है कि जो पार्टी के साथ विश्वासघात करेंगे, उन्हें जिंदा नहीं छोड़ा जाएगा। पार्टी विद्रोहियों की हत्या का आदेश जारी करती है और कार्यकर्त्ता उस आदेश को क्रियान्वित करते हैं। उन्होंने बताया कि 1982 में हमारी पार्टी ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का सफाया करने के लिए 13 नामों की सूची बनायी। सूची के पहले नाम वाले को हमने गोली मार दी, दूसरे नाम वाले को हमने छुरा घोंपकर मार डाला, तीसरे नाम वाले को हमने पीट-पीटकर मार डाला। यद्यपि मणि ने मारे गये तीनों व्यक्तियों के नाम नहीं लिये, किन्तु स्पष्ट ही वे स्थानीय कांग्रेसी कार्यकर्त्ता थे। इनमें बेबी अंचेरी को नवम्बर, 1982 में गोली मारी गयी। मुल्लनचिरा मथाई को जनवरी, 1983 में पीट-पीटकर मार डाला गया और मुत्तुकड ननप्पन को जनवरी 1983 में छुरा घोंपकर मार डाला।

मणि की यह स्वीकारोक्ति केरल माकपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में विपक्ष के नेता 89 वर्षीय वी.एस.अच्युतानंदन और राज्य माकपा के सचिव पिनरई विजयन की गुटबंदी में फंस गयी है। मणि कभी अच्युतानंदन के प्रति वफादार होते थे, पर अब पिनरई गुट में शामिल हो गये हैं। टी.पी.चन्द्रशेखन की हत्या पर भी इस गुटबंदी की छाया स्पष्ट दिख रही है। अच्युतानंदन ने हत्या के बाद चन्द्रशेखरन को 'बहादुर कम्युनिस्ट' कहा तो पिनरई ने 'गद्दार' कहा। अच्युतानंदन चन्द्रशेखरन के घर शोक प्रकट करने गए तो चन्द्रशेखरन के हजारों समर्थकों ने उनका जोरदार स्वागत किया। अच्युतानंदन ने चन्द्रशेखरन की समाधि पर पुष्प चढ़ाकर श्रद्धाञ्जलि दी।

हत्या की राजनीति

पर इस गुटबंदी से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हत्या की राजनीति माकपा की अधिकृत कार्यशैली है? क्या उसने यह कार्यशैली अपनी विचारधारा से प्राप्त की है। एक 95 वर्षीय कम्युनिस्ट कार्यकर्त्ता पनोली कृष्णन, जो 1949 में पार्टी के जन्मकाल से सक्रिय हैं, ने बताया कि पार्टी की स्थापना के समय में ही पार्टी कार्यकर्त्ताओं को गुरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया था। पनोली ने कहा कि मैंने स्वयं वह 'ट्रेनिंग' ली थी और जब पार्टी की बैठकें होती थीं तब मुझे हथियार लेकर पहरे पर खड़ा कर दिया जाता था, ताकि कोई अवांछनीय व्यक्ति उस बैठक की बातें न सुन सके। पनोली ने बताया कि 1964 में माकपा के गठन के बाद गोपाल सेना के नाम से यह ट्रेनिंग चलती रही। राज्य पुलिस से निष्कासित एक पुलिस अधिकारी बी.के.बालन इस सेना के प्रमुख बनाये गये। 1970 से एम.वी.राघवन उसके प्रमुख रहे। पिनरई विजयन, कोदियारी बालाकृष्णन आदि कन्नूर के सभी प्रमुख नेता राघवन के द्वारा प्रशिक्षित किए गए हैं। 1986 में राघवन भी पार्टी से निष्कासित कर दिये गये।

माकपा विपक्षी दलों की ही नहीं, अपने कार्यकर्त्ताओं की असहमति को दबाने के लिए कितनी क्रूरता बरतती है, इसका उदाहरण कन्नूर के कायलेडु नामक गांव के एक 32 वर्षीय युवक पी.टी.नित्यानंद की दर्दनाक कहानी है। नित्यानंद पार्टी के युवा संगठन में सक्रिय था। उसका विवाह हुआ। पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ गयीं। उसने लकड़ी का छोटा-सा व्यापार शुरू किया। पार्टी ने उस पर निष्क्रियता का आरोप लगाया। उससे उसकी आय का बड़ा हिस्सा पार्टी को देने को कहा। वह अपने पारिवारिक दायित्वों के कारण यह मांग पूरी करने में असमर्थ था। फलत: 24 सितम्बर, 2011 को उस पर प्राणघातक हमला किया गया, पर वह बाल-बाल बच गया। वह इस समय अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा मौत से जूझ रहा है। उसके छह आपरेशन किये जा चुके हैं।

पार्टी ने इन हत्यारों (कार्यकर्ताओं) को बचाने का एक पूरा शास्त्र विकसित कर रखा है। यदि वे सरकार में होते हैं तो हत्या की जांच को टालते रहते हैं। टालना संभव न होने पर कुछ झूठे नामों के आरोपियों की सूची देते हैं। हत्यारों को कानूनी मदद देते हैं, उनके परिवार की देखभाल करते हैं और केस को लम्बे समय तक लटका कर उन्हें निरपराध घोषित कर दिया जाता है। कभी-कभी वे उनसे अपने संबंध को छिपाते भी नहीं हैं। अन्दियेरी सुरा नामक एक माकपाई 2001 में मुस्लिम लीग के किसी कार्यकर्त्ता की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास भुगत रहा है, किन्तु उसकी पुत्री के विवाह में पोलित ब्यूरो के सदस्य कोदियारी बालाकृष्णन कई कार्यकर्त्ताओं को साथ लेकर सम्मिलित हुए।

केरल में गुटबाजी

पार्टी के कुछ कार्यकर्त्ता अब स्वीकार करने लगे हैं कि पार्टी में भय का वातावरण छाया हुआ है। हत्या के डर से अनेक कार्यकर्त्ता अपना मतभेद प्रकट नहीं कर पा रहे हैं। कन्नूर जिले में पुचायिल नानू नामक एक माकपाई नेता के दो भतीजे माकपा छोड़कर भाजपा में चले गये थे, इसलिए उनकी हत्या कर दी गयी। उनकी हत्या से छटपटाया पुचायिल नानू फिर भी अपनी जान बचाने के लिए पार्टी में बना रह गया। कायलोड के शिनोज के. ने पार्टी से रिश्ता तोड़ लिया है। उसका कहना है कि पार्टी में असंतुष्ट कार्यकर्त्ताओं की संख्या बहुत बड़ी है पर उन्हें गांव से निष्कासन और जान जाने का खतरा सताता है। कायलोड गांव को माकपा का गढ़ कहा जाता है वहां हर चौराहे और घर पर लाल झंडे फहराते हैं। पार्टी में गुटबंदी ऊपर से नीचे तक व्याप्त है। कहा तो यह भी जा रहा है कि एम.एम. मणि का 26 मई का भाषण अपने पुराने नेता अच्युतानंदन को फंसाने के इरादे से पिनरई विजयन की शह पर दिया गया था, क्योंकि 1982-83 में अच्युतानंदन ही केरल के राज्य सचिव थे। पर अच्युतानंदन की लोकप्रियता से डरे केन्द्रीय नेतृत्व में उनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं है। इसलिए षड्यंत्रकारी तरीकों से उनके पर काटने की कोशिशें चल रही है, जैसा कि 2008 में कोट्टायम में पार्टी कांग्रेस के गुप्त दस्तावेजों को मीडिया तक पहुंचाने के लिए अच्युतानंदन के तीन अति विश्वस्त सहयोगियों को दोषी ठहराया गया है, और ऐसे में शायद उन्हें पार्टी से निकाल दिया जाएगा। प्रकाश कारत केरल और बंगाल की पराजय के बाद भी महासचिव बने रह सके, इसका श्रेय पिनरई विजयन गुट के समर्थन को दिया जा रहा है। कारत ने दिल्ली में केन्द्रीय बैठक के बाद दोनों गुटों के नेताओं से कोई सार्वजनिक वक्तव्य न देने की अपील की है। किन्तु अपने वक्तव्य में अच्युतानंदन का नामोल्लेख करके उन्होंने पिनरई के प्रति अपना झुकाव स्पष्ट कर दिया।

लबादा लोकतंत्र का, विचारधारा हिंसक

अपने बागियों और विपक्षियों के दमन का जो वातावरण केरल की माकपा में व्याप्त है, वही वातावरण प.बंगाल और कुछ अंशों में त्रिपुरा में भी पाया गया है। त्रिपुरा में वरिष्ठतम कम्युनिस्ट नेता नृपेन चक्रवर्ती के असहमति के स्वर को जिस प्रकार दबाया गया, वह सर्वज्ञात है। प.बंगाल में वरिष्ठ मंत्री विजय कृष्ण चौधरी की जो दुर्गति हुई, वह किसी से छिपी नहीं है। 1998 से 2004 के मध्य कई बार मुझे कोलकाता जाने का अवसर मिला। एक बार वहां प्रोफेसरों एवं पत्रकारों के साथ बैठना हुआ। वे वहां के दमघोंटू वातावरण से त्रस्त थे, किन्तु मुंह खोलने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। उनका कहना था कि यहां विश्वविद्यालयों, विद्यालयों, पत्रकार क्षेत्रों, यहां तक कि पुलिस बलों में भी पार्टी नियंत्रित ट्रेड यूनियनिज्म इतना व्यापक हो गया है कि असहमति का स्वर दबाने के लिए ट्रेड यूनियन का हमला शुरू हो जाता है और बोलने वाले का उत्पीड़न होता है। एक कालेज छात्र ने बताया कि हमारे कालेज में माकपाई छात्र गुंडागर्दी को तैयार रहते हैं, अध्यापक भी उनसे डरते हैं। ऐसे भय के वातावरण को भेदकर ममता बनर्जी माकपा के 35-36 वर्ष लम्बे आतंक राज्य को समाप्त कर सकीं, यह आश्चर्य की ही बात है। अपने अल्प कार्यकाल में उन्हें जिस प्रकार के बौद्धिक षड्यंत्रों का सामना करना पड़ रहा है, उसे मीडिया की आंखों से देखने की बजाय अपनी आंखों से देखना व समझना चाहिए।

हिंसा की राजनीति कम्युनिस्ट विचारधारा में शुरू से विद्यमान है। लेनिन ने प्रोलीतेरियन डिक्टेटरशिप (सर्वहारा तानाशाही) को जो विकृत रूप प्रदान किया, वह शायद मार्क्स की कल्पना नहीं थी। लेनिन का विरोध करने के कारण जर्मनी की प्रखर मार्क्सवादी विचारक रोजा लक्जमबर्ग की हत्या करवाई गयी। स्तालिन ने रूस में सत्ता परिवर्तन के एक प्रमुख सेनापति लियो ट्राटस्की को पहले तो देश छोड़ने के लिए विवश किया और फिर दूरस्थ मैक्सिको में उसकी हत्या करवा दी। 1956 में निकिता खुश्चेव ने स्तालिन युग की क्रूरताओं का जो हृदय विदारक वर्णन प्रस्तुत किया, उसे सुनकर सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की बीसवीं कांग्रेस का वह गुप्त सत्र सिसकियों से भर गया था। भारत में भी कम्युनिस्ट पार्टी की परम्परा इससे भिन्न नहीं रही है। इसके लिए मोहित सेन जैसे पुराने कम्युनिस्ट नेताओं के संस्मरणों को पढ़ना बहुत जरूरी है। यह सच है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने 1957 में अपनी अमृतसर कांग्रेस में भारतीय संविधान के अंतर्गत चुनाव प्रकिया में भाग लेने का प्रस्ताव पारित किया था, किन्तु वह प्रस्ताव आंतरिक विचार मंथन में से पैदा न होकर रूस के तानाशाह स्तालिन द्वारा भारतीय कम्युनिस्टों के एक उच्चस्तरीय गुप्त प्रतिनिधिमंडल को दी गयी फटकार का परिणाम था। उस समय अमरीका के विरुद्ध शीतयुद्ध में उलझे सोवियत संघ से भारत सरकार की मित्रता आवश्यक लग रही थी, इसलिए स्तालिन ने खूनी संघर्ष का रास्ता छोड़कर भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहभागी बनाने का आदेश दिया था। किन्तु लोकतंत्र उनका मानस नहीं है, हिंसा उनकी चेतना में गहरे तक समायी हुई है।

 



हमारे मीडिया की प्राथमिकताएं

हमारे मीडिया की प्राथमिकताएं

देवेन्द्र स्वरूप

क्या हमारा मीडिया सत्ता राजनीति की उठा-पटक और सैक्स-अपराध की कहानियों से ऊपर उठकर दर्शकों की सुप्त आध्यात्मिक चेतना को जगा सकता है? उन्हें सादगी की जीवन शैली के सुख की अनुभूति करवा सकता है?

हमारी दौड़-धूप भरी जिंदगी में हमें विश्व और समाज से जोड़ने वाला एकमात्र पुल मीडिया ही रह गया है। इस पुल पर कई समानांतर कतारे हैं-प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया और इंटरनेट। इनमें भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अर्थात समाचार वाहिनियां (न्यूज चैनल्स) सर्वाधिक सुगम और लोकप्रिय बन गए हैं-चलते-फिरते, खाते-बैठते-सोते, कभी भी टेलीविजन पर खबरों को देखा-सुना जा सकता है, और वह एक ही खबर को दिन में अनेक बार दोहराता रहता है। इसी क्रम में कल 20 जून, 2012 (बुधवार) को लगभग सभी खबरिया चैनलों पर सुबह से शाम तक एक ही समाचार और उस पर बहस छायी रही। समाचार सिर्फ इतना था कि दो वर्ष बाद होने वाले लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री पद की दौड़ में आगे रहने के आकांक्षी एक मुख्यमंत्री ने एक अंग्रेजी दैनिक को दिए साक्षात्कार में भावी प्रधानमंत्री के लिए कुछ सीमाएं बांधने की कोशिश की, पर उस साक्षात्कार को सभी चैनलों ने किसी दूसरे मुख्यमंत्री पर केन्द्रित करके दोनों के बीच एक अशोभनीय विवाद खड़ा कर दिया। मजे की बात यह है कि जिन दो मुख्यमंत्रियों को अखाड़े में धकेलकर कुश्ती कराने का प्रयास किया गया, उनमें से किसी ने भी किसी का नाम नहीं लिया और मीडिया के बार-बार उकसाने पर भी उन्होंने इस बारे में मौन रहना उचित समझा।

दृश्य कौन-सा देखें?

जिस समय हमारा समूचा मीडिया सत्ता राजनीति की इस काल्पनिक कुश्ती में रस ले रहा था, उस समय राजधानी दिल्ली में पानी और बिजली संकट से त्राहि-त्राहि मची हुई थी। बच्चे-बूढ़े-महिलाएं हर कोई बेहाल था। व्याकुल लोग सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए सड़कों पर घड़े, मटके फोड़ रहे हैं। आम आदमी की पीड़ा का तो इससे ही अंदाजा लगा सकते हैं कि देश के प्रधानमंत्री, राजधानी की मुख्यमंत्री और सांसदों के घरों तक भी टैंकरों द्वारा पानी पहुंचाने की व्यवस्था करनी पड़ रही है। दिल्ली अपने पड़ोसी राज्य हरियाणा से पानी और बिजली की याचना कर रहा है और हरियाणा के मुख्यमंत्री ने अपने राज्य की सीमा बताकर हाथ खड़े कर दिये हैंै। पर, हमारा मीडिया इस बुनियादी जीवन संकट के बारे में उदासीन प्रतीत हो रहा है। क्या सचमुच उसके लिए मानव जीवन और सभ्यता के अस्तित्व से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है सत्ता के टुकड़ों के लिए राजनेताओं और दलों की आपसी उठापटक? सत्ता राजनीति और मानव सभ्यता की रक्षा के दो प्रश्नों में से उसकी प्राथमिकता क्या है? यदि मीडिया की भूमिका लोक जागरण और लोक शिक्षण है तो वह समाज को किस दिशा में ले जाना चाहता है? क्या मानव जीवन जल, वायु और अन्न के बिना चल सकता है? और क्या बिजली अथवा किसी भी अन्य ऊर्जा शक्ति के बिना वर्तमान सभ्यता का चक्का चल सकता है? आज ही के समाचार पत्रों के एक कोने में छपा कि धरती पर जनसंख्या के सामान्य आंकड़ों के अतिरिक्त मोटे लोगों के कारण 24.2 करोड़ लोगों की संख्या का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। 'लंदन स्कूल आफ हाइजीन एंड ट्रापिकल मेडीसिन' के अनुसंधानकर्त्ताओं के अनुमान के अनुसार सन् 2050 तक पृथ्वी पर जो जनसंख्या होगी, उसमें मोटे लोगों के कारण भार और बढ़ेगा, उनके लिए अधिक कैलोरीज की आवश्यकता पड़ेगी। इस आवश्यकता को भोजन के द्वारा पूरा करना होगा, जिससे पहले से सिकुड़ रहे संसाधनों पर अधिक दबाब पड़ेगा। अब प्रश्न उठता है कि यह मोटापा बीमारी का लक्षण है या समृद्धि का? मोटे लोगों की संख्या अमरीका जैसे देशों में बढ़ रही है उससे स्पष्ट है कि यह समृद्धि का परिणाम है, क्योंकि दुनिया के अधिकांश अविकसित देशों में तो पिचके पेट और अस्थि पंजर वाले बच्चे-बूढ़ों के चित्र ही सामने आते हैं। ये दो परस्पर विरोधी चित्र विकास की वर्तमान दिशा में से उत्पन्न आर्थिक विषमता के परिचायक हैं।

बढ़ता संकट

वस्तुत: हम विकास के दुष्चक्र में फंस गये हैं। 'टैक्नालॉजी' लगातार शरीर सुख, मनोरंजन और देशकाल पर विजय के साधन रूप में नये-नये उपकरणों का आविष्कार करती जा रही है। ये उपकरण क्रमश: विलासिता से आगे बढ़कर हमारे जीवन की आवश्यकता बनते जा रहे हैं। इन सब उपकरणों का प्रयोग करने के लिए विद्युत या ऊर्जा शक्ति का प्राप्त होना अनिवार्य है, उसके बिना इनका उपयोग संभव ही नहीं है। इसलिए पूरे विश्व में ऊर्जा के संसाधनों पर अधिकार जमाने की होड़ लगी हुई है। इन उपकरणों और उन्हें चालू रखने वाले ऊर्जा स्रोतों की प्राप्ति ही देशों और उनकी जनंसख्या के भीतर दारिद्र्य की व्याख्या की कसौटी बन गयी है। प्रत्येक गांव, प्रत्येक घर, प्रत्येक व्यक्ति तक 'टैक्नालॉजी' की इन नियामतों का पहुंचना ही विकास की सफलता का निष्कर्ष बन गया है। अधिकाधिक परिवारों को सुख के ये उपकरण प्राप्त होने को ही जीवन स्तर का ऊपर उठना कहा जाता है और मनुष्य जिस जीवन स्तर का एक बार आदी हो जाता है उससे बाहर निकलना अत्यंत कष्टकारी बन जाता है। यूरोप और अमरीका आदि समृद्ध देश इस समय इस संकट से गुजर रहे हैं। यूरोप में ग्रीस, स्पेन और इटली आदि देशों के सामने विदेशी कर्ज के सहारे ऊपर उठाये गये जीवन स्तर को नीचे लाने का संकट खड़ा हो गया है। उनके अर्थ संकट ने 'यूरो जोन' नामक मुद्रा क्षेत्र के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। चूंकि यह संकट यूरोप के समृद्ध देशों का संकट है, इसीलिए मैक्सिको के सुदूर दक्षिणी छोर पर स्थित लास काषोस नामक एक रमणीक पर्यटन स्थल पर आयोजित जी-20 सम्मेलन पर 'यूरो जोन' का संकट ही छाया रहा। यहां तक कि भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी यूरोप को इस संकट से बाहर निकालने के लिए भारतीय कोष से 10 अरब डालर का योगदान देना उचित समझा। कैसी विचित्र स्थिति है कि जिस देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है, उनकी ठीक से पहचान नहीं हो पा रही है, जो अपनी अर्थव्यवस्था को जिंदा रखने के लिए दो लाख, सोलह हजार, दो सौ सत्तानवें (2,16,297) करोड़ रुपये की सब्सिडी एक साल (2011-12) में खर्च करता है, जिस पर सब्सिडी का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है, वह यूरोप के ऊंचे जीवन स्तर को टिकाए रखने के लिए 10 अरब डालर का योगदान करे। यह कर्जा लेकर कर्जा देने का हास्यास्पद उदाहरण नहीं तो और क्या है?

विरोधाभासी जीवन

रोज चेतावनियां मिल रही हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था लगातार नीचे गिर रही है, नदियां सूख रही हैं, गंगा और यमुना जैसी प्रमुख नदियों का जल पीना तो दूर, नहाने लायक तक नहीं बचा है। गंगा के प्रति जो सहस्राब्दियों से चली आ रही धार्मिक श्रद्धा है, उससे अभिभूत होकर संत शक्ति गंगा की रक्षा के लिए मैदान में उतर पड़ती है, पर वे इसका एक ही हल सुझाते हैं कि उत्तराखंड राज्य में गंगा नदी पर विद्युत उत्पादन के लिए जो अनेक बांध बनाये गये हैं, उन्हें तुरंत बंद कर दिया जाए। वे गंगा के प्रदूषण के लिए केवल सरकारी योजनाओं को दोषी मानते हैं और उसे निर्मल व शुद्ध बनाए रखने की पूरी जिम्मेदारी सरकार के मत्थे मढ़कर समाज को उस जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त कर देना चाहते हैं। उन्हें विश्वास है कि गंगा नदी को 'राष्ट्रीय नदी' घोषित कर देने मात्र से उस पर छाया संकट टल जाएगा। वे भूल जाते हैं कि गंगा नदी का संकट सब नदियों का संकट है।

हमारी त्रासदी यह है कि एक ओर तो हम आधुनिक तकनीकी द्वारा प्रदत्त सब सुविधाओं को अपने लिए पाना चाहते हैं, पर साथ ही हम अन्य देशवासियों को उनसे दूर रहने का उपदेश देते रहते हैं। हमने अपने दिमागों में ग्राम और शहर की दो समानांतर सभ्यताओं का कल्पना चित्र तैयार कर रखा है। जबकि वास्तविकता यह है कि प्रत्येक ग्रामवासी अब शहरी सुविधाओं को पाना चाहता है। उन सुविधाओं को पाने के लिए वह गांव छोड़कर शहर की ओर भागने के लिए लालायित है, अथवा वह अपने गांव में ही उन सब सुविधाओं को पाना चाहता हे। बढ़ती हुई जनसंख्या में प्रत्येक परिवार को आधुनिक तकनीकी द्वारा प्रदत्त सुविधाओं की उत्पादन प्रक्रिया भी पर्यावरण के लिए घातक है। हम चाहते हैं कि वे सब सुविधाएं तो सबको मिल जाएं पर उनके उत्पादन के लिए प्राकृतिक संसाधानों जैसे जल स्रोतों, खनिज पदार्थों और वन-संपदा आदि का दोहन न हो। इसलिए एक ओर पूरे विश्व में विकास के 'पश्चिमी मॉडल' को अपनाकर जीवन स्तर को ऊंचा उठाने की होड़ लगी हुई है तो दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों के साथ छेड़छाड़ न करने के लिए जनांदोलनों को भी भड़काया जाता है। इन आंदोलन को भड़काने वाले समाज सुधारक यदि अपने जीवन में झांके तो दिखायी देगा कि वे स्वयं शहरी जीवन की सुविधाओं से पूरी तरह सम्बंध विच्छेद करने की सिद्धता नहीं रखते। क्या गांव-गांव और घर-घर तक बिजली पहुंचाने की मांग वास्तविक नहीं है? भारत जैसे विशाल देश की विशाल जनसंख्या के लिए इतनी अधिक मात्रा में बिजली का उत्पादन कैसे होगा? बिजली पैदा करने के जो पांच साधन हैं-पानी, कोयला, अणुशक्ति, हवा और सूर्य, इनमें से किस साधन को यह देश अपनाने की स्थिति में है? एक ओर तो जनसंख्या बढ़ रही है, नगरी करण की गति तेज हो रही है, दूसरी ओर इनके कारण प्राकृतिक संसाधन सिकुड़ते जा रहे हैं और पर्यावरण नष्ट हो रहा है। विकास की वर्तमान दिशा और पर्यावरण विनाश एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, वे एक-दूसरे से अन्योनाश्रित जुड़े हुए हैं।

दुष्चक्र में फंसा आम आदमी

अब यह स्पष्ट दिखायी दे रहा है कि आर्थिक और भौतिक विकास के जिस रास्ते पर मानव जाति चल रही है, वह आत्मनाश का रास्ता है। 'मय' जाति को लुप्त पंचागों की खोज करके उस आत्मनाश को टाला नहीं जा सकता, न ही 'जी-20' और 'रियो डि जेनेरियो' के सम्मेलन इस समस्या का हल खोज सके हैं, क्योंकि कोई भी देश अपने जीवन स्तर में कटौती करने को तैयार नहीं है। एक ओर अधिकाधिक शस्त्रास्त्रों को प्राप्त करने और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने की होड़, अपने उत्पादन को बढ़ाने, विज्ञापनों के द्वारा उनके लिए अधिक बाजारों की खोज की जा रही है, तो दूसरी ओर सभ्यता के विनाश की भविष्यवाणियां की जा रही है। इस समय तकनीकी के इन आधुनिक नियामतों को गांव-गांव पहुंचाने के लिए पूरा विज्ञापन तंत्र गांवों पर केन्द्रित हो गया है। ग्रामवासियों में उन उपकरणों के लिए भूख जगायी जा रही है। विद्यालयों में प्राथमिक स्तर पर कम्प्यूटर की शिक्षा देने एवं प्रत्येक बच्चे के हाथ में मोबाइल थमाने को प्रगति का लक्षण बताया जा रहा है।

इस दुष्चक्र से बाहर निकलना कैसे संभव है? अभी 19 जून को इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख पढ़ा, जिसमें कहा गया कि 300 वर्ष पूर्व जन्मे फ्रांसीसी चिंतक रूसो की धारणा थी कि आधुनिक तकनीकी के प्रादुर्भाव के पूर्व मनुष्य सही अर्थों में सुखी था। यह कितना सच है कहना कठिन है, क्योंकि तकनीकी की यात्रा तो मानव सभ्यता के जन्म के साथ ही शुरू हो गयी थी। तब हजारों साल में कोई नया आविष्कार होता था, अब उसकी गति बहुत तीव्र है, प्रत्येक सप्ताह कोई न कोई नया उपकरण बाजार में आ जाता है और विज्ञापन तंत्र व्यक्ति-व्यक्ति तक उसकी जानकारी पहुंचा देता है। बौद्धिक धरातल पर हम इस प्रक्रिया के दुष्परिणामों को देख-समझकर भी क्या सभ्यता की इस दौड़ से बाहर निकलने का आत्मबल अपने भीतर पाते हैं? यह आत्मबल कोई सरकार हम पर नहीं थोप सकती। यह तो हमारे भीतर से ही जाग्रत हो सकता है और यहीं मीडिया की भूमिका आ जाती है। क्या हमारा मीडिया सत्ता राजनीति की उठा पटक और सैक्स,  अपराध की कहानियों से ऊपर उठकर दर्शकों की सुप्त आध्यात्मिक चेतना को जगा सकता है? उन्हें सादगी की जीवन शैली के सुख की अनुभूति करवा सकता है? उनके सामने वैकल्पिक सभ्यता का कोई चित्र खड़ा कर सकता है? पर क्या टेलीविजन की अपनी दुनिया के भीतर यह परिवर्तन संभव है? हमारे पास केवल प्रश्न हैं, उनके उत्तर नहीं।


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