उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह सदन की सदस्यता का पिछला रास्ता ही चुना। मनमोहन को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री बने सात साल हो गये, पर आज तक कहीं से भी लोकसभा का चुनाव लड़ने का साहस नहीं जुटा पाये। नतीजतन उस असम से राज्यसभा सदस्य बने हुए हैं, जिससे उनका कभी दूर-दूर तक का संबंध नहीं रहा। बेशक अखिलेश वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में एक नहीं, दो-दो सीटों, फिरोजाबाद और कन्नौज से लोकसभा के लिए चुने गए थे। संविधान के मुताबिक एक ही सीट का प्रतिनिधित्व किया जा सकता है, सो उन्होंने फिरोजाबाद की सीट छोड़कर वहां से अपनी पत्नी डिम्पल को लोकसभा भेजना चाहा, लेकिन मतदाताओं ने परिवारवाद के विस्तार की इस पराकाष्ठा के मंसूबे पर पानी फेरते हुए कांग्रेस के टिकट पर फिल्म अभिनेता राज बब्बर को जिता दिया, जिन्हें कुछ ही महीने पहले पड़ोसी फतेहपुर सीकरी के मतदाताओं ने नकार दिया था। विधानसभा में जबर्दस्त बहुमत के बावजूद मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश ने विधान परिषद की सदस्यता का सुरक्षित विकल्प चुना और इस बार भी अपने इस्तीफे से खाली हुई कन्नौज सीट के लिए डिम्पल को मैदान में उतार दिया, पर इस बार नजारा एकदम बदल गया। सबसे पहले तो वह कांग्रेस रणछोड़ बनी जिसकी सरकार बनने का सपना तीन महीने पहले तक 'युवराज' उत्तर प्रदेश में घूम घूमकर बेच रहे थे। फिर वह बहुजन समाज पार्टी भी चुनाव मैदान छोड़ गयी, जो तीन महीने पहले तक उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ थी और आज भी मुख्य विपक्षी दल है। भाजपा के साथ जो हुआ, वह तो वाकई कमाल था। पार्टी ने उम्मीदवार तो तय कर लिया, पर वह निर्धारित समय अवधि में नामांकन दाखिल करने ही नहीं पहुंच सका। फिर निर्दलियों की क्या बिसात कि डिम्पल के मुकाबले टिकते। सो, वह निर्विरोध लोकसभा के लिए चुन ली गयीं। जाहिर है, सपाइयों में जश्न का माहौल है, पर लोकतंत्रवादी क्या करें?
दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी की गिनती सत्ता के चर्चित सौदागरों में होती है। उनके कहने से देश के कितने मुसलमान वोट डालते हैं, यह तो विवाद का विषय है, पर हर चुनाव से पहले उनका दरबार अवश्य सज जाता है। इस बार भी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले यही हुआ। आखिर देश के इस सबसे बड़े राज्य में लगभग एक चौथाई सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक स्थिति में जो हैं। हालांकि मुसलमानों को समाजवादी पार्टी के पक्ष में गोलबंद करने में बसपा-भाजपा की संभावित मित्रता संबंधी दुष्प्रचार ने ही निर्णायक भूमिका निभायी, पर बुखारी की दुकान चल पड़ी है, क्योंकि चुनाव से पहले ही उन्होंने सपा को समर्थन का ऐलान कर दिया था। चुनाव में तो उनके दामाद बुरी तरह हार गये, पर उसके बाद भी वह मुसलानों के नाम पर सत्ता में हिस्सेदारी मांगते रहते हैं, पर किन मुसलमानों के लिए, यह जानना दिलचस्प है। ताजा मसाला मलाईदार समझे जाने वाले उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष पद का है। अखिलेश सरकार ने इस पद पर दिल्ली के एक बिल्डर वसीम अहमद खान की नियुक्ति की है। वसीम बुखारी के करीबी तो हैं ही, मनमोहन सिंह सरकार के एक चर्चित मंत्री की पत्नी के साथ मांस निर्यात के कारोबार में साझीदार भी हैं। अब आप हिसाब लगाते रहिए कि सत्ता के सौदागरों के तार कहां से कहां जुड़ते हैं।
पहले किंगफिशर का आर्थिक संकट और फिर एयर इंडिया के पायलटों की हड़ताल। किसान नेता से नागरिक उड्डयन मंत्री बने राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख अजित सिंह लगातार चर्चा में हैं। कोई उनके कड़े रुख की तारीफ कर रहा है तो कोई उसके पीछे के निहितार्थ तलाशने की कोशिश कर रहा है, पर इस सबसे इतर छोटे चौधरी की राजनीतिक छटपटाहट का अहसास किसी को नहीं है। मुलायम सिंह यादव की पिछली सरकार में उत्तर प्रदेश में रालोद भी भागीदार था। सत्ता की मलाई में भी उसका अच्छा-खासा हिस्सा था, लेकिन वर्ष 2007 के विधानसभा चुनावों से पहले ही कांग्रेस ने अजित को गठबंधन और केन्द्र में मंत्री पद का लॉलीपॉप दिखा कर रालोद को सपा से अलग करा दिया। लंबे इंतजार के बाद वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों से कुछ ही पहले जाकर वह गठबंधन हो पाया और अजित मंत्री बन पाये, लेकिन चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस की मुलायम से नजदीकियों ने उनकी छटपटाहट बढ़ा दी है। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि कांग्रेस-सपा की बढ़ती नजदीकियों के बीच उनके लिए जगह कहां और कितनी बचेगी।
आखिरकार वही हुआ, जिसका डर था। 'बंगाल की शेरनी' कही जाने वालीं मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी को समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने जोर का झटका धीरे से दे दिया। 22 लोकसभा सदस्य होने और कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन देने के बावजूद बाहर से ही सत्ता की मलाई ताकने को मजबूर मुलायम ने राष्ट्रपति चुनाव के बहाने कुछ ऐसा दांव चला कि तृणमूल संप्रग से बाहर हो जाये और सपा को वहां प्रवेश मिल जाए। पश्चिम बंगाल में तीन दशक पुराने वाम शासन को उखाड़ फेंककर नया राजनीतिक इतिहास लिखने वालीं ममता उनके झांसे में आ भी गयीं। मुलायम ने अपने ही आवास पर ममता के साथ एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस की पसंद प्रणब मुखर्जी या हामिद अंसारी के नाम खारिज कर एपीजे अब्दुल कलाम, मनमोहन सिंह और सोमनाथ चटर्जी के नाम सुझाये। एक जुझारू नेता की तरह ममता तो इस मुद्दे पर कांग्रेस नेतृत्व से भिड़ने को तैयार हो गयीं, पर आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक आय समेत भ्रष्टाचार के तमाम मामलों में घिरे और सीबीआई जांच में फंसे मुलायम ने रातोंरात कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार से सौदा कर लिया। एक दिन पहले जिन प्रणब का नाम प्रेस काफ्रेंस में खारिज किया था, अचानक उनका राजनीतिक कद विराट नजर आने लगा। पता नहीं यह साम,दाम, दंड,भेद में से किस किस हथकंडे का प्रभाव था, लेकिन ममता को भड़काने वाले मुलायम ने ही उन्हें धोखा देकर एक बार फिर साबित कर दिया कि उन पर भरोसा खुद को जोखिम में डालने वाला ही हो सकता है। काश, ममता ने मायावती के अनुभव से कुछ सीख ले ली होती!
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह बेलगाम मिसाइल सरीखे हैं। कांग्रेस 'युवराज' राहुल गांधी के सलाहकार माने जाने वाले दिग्विजय ऊलजलूल बयानों के लिए बदनाम हैं। मध्य प्रदेश की सत्ता से बेदखल हो जाने के बाद तो दूसरों पर व्यंग्य बाण छोड़ना ही उनका काम रह गया है। कभी योगगुरू रामदेव को ठग कहते हैं तो कभी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को रावण। दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा की शहादत वाली बटला हाउस मुठभेड़ उन्हें उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक वोटों की खातिर 'फर्जी' नजर आने लगती है तो मुम्बई पर आतंकी हमले के दौरान शहीद आतंकवाद निरोधक शाखा के प्रमुख हेमंत करकरे की शहादत के पीछे भी उन्हें साजिश की बू आती है। यह तो तब है जब राष्ट्र, महाराष्ट्र और दिल्ली, तीनों ही जगह कांग्रेस की सरकार है। मीडिया में बयानबाजी के लिए तो दिग्गी राजा लालायित ही रहते हैं। वह दिल्ली से बाहर होने पर भी टेलीफोन पर ही प्रतिक्रिया देने को तैयार हो जाते हैं। जुबान तो जहरीली है ही, सो मीडिया, खासकर टीवी न्यूज चैनलों को पसंद भी हैं, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव पर कांग्रेस-ममता के बीच तनातनी में बोलकर बेचारे बुरे फंस गये। एक टीवी इंटरव्यू में ममता को अपरिपक्व और अस्थिर बताने के साथ-साथ उन्होंने दो टूक ऐलान कर दिया कि एक सीमा से आगे नहीं झुका जा सकता। मानो वह इस पूरी प्रक्रिया में मुख्य मध्यस्थ रहे हों। बस, फिर क्या था, बेलगाम दिग्विजय के विरोधी कांग्रेसियों को तो जैसे इसी मौके का इंतजार था। सो, फरमान जारी हो गया कि दिग्विजय सिंह कांग्रेस की ओर से बोलने को अधिकृत नहीं हैं। जब कांग्रेस ने ही पल्ला झाड़ लिया तो अब मीडिया भी उन्हें क्यों भाव देगा? 'युवराज' ही इस संकट से उबार लें तो बात अलग, वरना कांग्रेसी इसे दिग्गी के दुर्दिनों की शुरुआत मान रहे हैं।
हरीश रावत को जानते हैं आप? केन्द्र सरकार में संसदीय कार्य और कृषि मंत्रालय में राज्यमंत्री हैं, पर उनका एकमात्र सपना उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनना है। पिछली बार जब मतदाताओं ने कांग्रेस को जनादेश दिया तो बुजुर्ग नारायण दत्त तिवारी बाजी मार ले गये और पांच साल के अंतराल के बाद इस बार जैसे-तैसे कांग्रेस की लाटरी खुली तो आलाकमान के दरबारियों ने रावत को दगा देकर विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनवा दिया। बेशक हरीश रावत ने उत्तराखंड में बहुत मेहनत की थी और मुख्यमंत्री पद के वह स्वाभाविक दावेदार थे। बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाये जाने पर रावत ने बागी तेवर भी दिखाये, पर जैसा कि अक्सर कांग्रेसियों के साथ होता है, सत्ता छोड़ संघर्ष का साहस नहीं जुटा पाये। कांग्रेस आलाकमान द्वारा बहुगुणा को नामित कर दिये जाने के बावजूद रावत मुख्यमंत्री बन सकते थे। थोड़ी हिम्मत दिखाते तो आलाकमान को फैसला बदलना पड़ सकता था। पर रावत की दुविधा ने न उन्हें कहीं का रखा और न ही उनके समर्थक विधायकों को, जिनके पास अब पाला बदलने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है। अपने पिता स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा की जोड़तोड़ की राजनीति के नक्शेकदम पर चलते हुए विजय बहुगुणा अपनी ताकत से कई गुना ज्यादा साबित हो रहे हैं।